प्लास्टिक मानव की ज़िंदगी में ड्रग
की तरह उतर गया है । वर्तमान में प्लास्टिक हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा उपयोग में ली जाने वाली वस्तुओं में से एक है। आस पास की हर छोटी से छोटी वस्तु प्लास्टिक की ही बनी होती है। मार्केट में सब्ज़ियों की दुकानों में जो सामान मिलता है वो प्लास्टिक में, जूस की स्ट्रॉ, प्लास्टिक की चम्मच व अन्य कई वस्तुएँ बड़े पैमाने पर उपयोग में ली जा रही है ।
हम नागरिकों का कर्तव्य बनता है की हम नेचर और सृष्टि के प्रति जागरूक रहकर मानव धर्म निभायें मानव धर्म मानवीय धर्म हैं ।
कोई भी व्यक्ति/या मानव जिस प्रकार से रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में प्लास्टिक का उपयोग करता है वो मानव, मानवता और नेचर सृष्टि में हानि का भागीदार बनता है ।
और इसके विपरीत अगर वो
व्यक्ति/मानव प्लास्टिक उपयोग ना करके उसकी जगह किसी और वस्तु से अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में उपयोग करता है ।यही मानव धर्म
नेचर/सृष्टि और मानवीय श्रृंखला को लाभ पहुँचाएगा। जल्द से जल्द हम भारतीय नागरिकों को ये बात हमारी छोटी सी ज़िदगी में उतारना चाहिए।
प्लास्टिक हम सबकी ज़िंदगी में जम सा गया है और ये निकलने का नाम नहीं ले रहा है ।
प्लास्टिक हमारे पर्यावरण प्रदुषण का सबसे खतरनाक कारक है और वो इसलिए भी की प्लास्टिक कई वर्षों तक नष्ट नहीं होता है ।
प्लास्टिक को जलाने से कार्बन मोनोक्साइड जैसी जहरीली गैस हवा में मिलती है। प्लास्टिक को नियंत्रित निपटान प्रणालियों के १००% संग्रह
कवरेज से निपटा जा सकता है जैसा की उच्च आय वाले देशों (HICs) में किया जाता है।
नेचर पत्रिका के एक अध्ययन के अनुसार हमारा देश भारत सालाना 5.8 मिलियन टन प्लास्टिक जलाता है और 3.5 मिलियन टन प्लास्टिक के मलबे को पर्यावरण में छोड़ता है।वैश्विक प्लास्टिक
प्रदुषण में भारत पाँचवे स्थान पर
है। इसी पत्रिका के अध्ययन अनुसार भारत की नदियों और समुद्र में हर साल 15 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा फेंका जा रहा है। वर्ष 2050 तक समुद्र में मछलियाँ कम और प्लास्टिक के टुकड़े ज़्यादा होंगे ।मेट्रोपोलिटन शहर मुंबई में समुद्री किनारों पर प्लास्टिक के कचरे को देखा जा सकता है।दिल्ली की नदियों में प्लास्टिक का कचरा तैरता हुआ देखा जा सकता है। हर वर्ष 100 मिलियन से भी ज्यादा समुद्री जीव प्लास्टिक कचरे से मर जाते है।
UNEP की रिपोर्ट के अनुसार प्लास्टिक का उपयोग यूँ ही चलता रहा तो 2050 तक लैंडफिल और पर्यावरण में 12 अख मैट्रिक टन प्लास्टिक का कुड़ा होगा ।
प्लास्टिक के इन दुष्प्रभावों से बचने के लिये हमें प्लास्टिक का उपयोग कम कर देना चाहिये।भारत में वैसे भी सिंगल युज प्लास्टिक पर बैन है ।प्लास्टिक की जगह
कपड़े के थैले का उपयोग लेना चाहिए
प्लास्टिक के चम्मच, स्ट्रॉ इत्यादि की जगह काग़ज़ का उपयोग में लेना चाहिए। जितना हो सके प्लास्टिक को रोजमर्रा की दैनिक कार्यो में उपयोग में नहीं लेना चाहिए । इस तरह प्रत्येक नागरिक अपने व्यक्तिगत स्तर से शुरू कर प्लास्टिक को बड़े पैमाने पर दूर कर सकते है ।इस से हमारे आस पास के जल स्रोत भी साफ़ रहेंगे और प्लास्टिक से गंदगी व बीमारियां भी नहीं फैलेंगी ।
हमारे देश में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में पिछले कुछ वर्षों में संशोधन किये गये हैं। ये संशोधन इस प्रकार है।
① भारत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
• इस नियमों की मुख्य विशेषताओं में स्त्रोत पर कचरे का अनिवार्य पृथक्करण, प्लास्टिक सामग्री के उपयोग और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना और 50 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाना शामिल था। नियमों में ईपीआर नीति भी लागू की गई।
② 2018 संशोधन
2018 के प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में संशोधन ने ईपीआर का विस्तार करते हुये इसमें अधिक हितधारकों को शामिल किया जिससे वे प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के लिए अधिक जवाबदेह बन गए।
③ 2021 संशोधन
भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में 2021 में एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर चरणबद्ध प्रतिबंध लागू किए गए।
④ 2024 संशोधन
यह संशोधन मुख्य रूप से ‘ग्रीनवाशिंग’ को रोकने और बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के प्रमाणन को सख्त करने पर केंद्रित है। यह 2016 के नियमों को मजबूत करता है, जिसमें कंपोस्टेबल प्लास्टिक के लिए CPCB से अनिवार्य प्रमाणन और ईपीआर (EPR) पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य है।
प्रकृति की रक्षा करना मानवीय
कर्तव्य है और हर नागरिक को अपने व्यक्तिगत स्तर पर इसे निभाना चाहिए ।
पायल शर्मा