ईश्वर, जीसस, अल्लाह सब निराकार है, पर सब का इंसान ने एक आकार बना लिया है, क्योंकि निराकार की पूजा कैसे करें?
पर क्या मूर्ति पूजा अंतिम ध्येय है, क्या सिर्फ़ आपने मूर्ति को पूज के अपना कर्तव्य पूरा कर लिया है?
इस पर ओशो कहते हैं,मूर्ति तो सिर्फ सेतु है ,आकार से निराकार की तरफ बढ़ने का, जब का ध्यान केंद्रित हो जाता है तो आकार फिर निराकार में बदल जाता है।
पर क्या मूर्ति पूजक इस बात को समझते हैं?
क्या उनका धर्म मूर्ति पूजा और मंदिरों की रक्षा करने में गुजर जाता है?
क्या उनके गुरु उनको आकार से निराकार की यात्रा के बारे में बताते हैं?
नहीं क्योंकि आकार पर अंधभक्ति हो सकती है, निराकार पे नहीं।
आकार पे दान दक्षिणा चढ़ सकती है, निराकार पर नहीं।
पंडित, मौलवी, धर्मगुरु सब लक्ष्मी भक्त हे लालची हो चुके है इसलिए धर्म की सही राह बताने की बजाय आपको मूर्ति पूजा तक सीमित रखते है।
मूर्ति के सामने बैठेंगे या जलती मोमबत्ती के सामने बैठेंगे कोई फर्क नहीं पड़ता, बस ध्यान से आकार को निराकार में बदलना ही असली पूजा है, फुल चढ़ाना नारियल चढ़ाना चादर चढ़ाना, दान दक्षिणा सिर्फ एक छलावा है जो
कुछ स्वार्थी गुरुओं का फैलाया हुआ भ्रम है ब्रह्म नहीं।