✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से
देश की राजनीति अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ सड़कें भी धर्म और दिखावे की प्रयोगशाला बन चुकी हैं।कभी किसी नेता को सड़क पर कांवड़ दिखती है, तो कोई उसे नमाज का मंच बना देना चाहता है। मज़े की बात यह है कि दोनों ही यह भूल जाते हैं —सड़कें पूजा या प्रदर्शन के लिए नहीं, चलने और जोड़ने के लिए होती हैं।
नगीना के सांसद चंद्रशेखर ने कहा — “जब कांवड़ के लिए सड़कें बंद हो सकती हैं, तो नमाज के लिए आधा घंटा क्यों नहीं?”उनके जवाब में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद बोले — “सड़क पर नमाज अल्लाह को भी कबूल नहीं होती।”बयान दोनों के हैं, लेकिन राजनीति की सियासत एक ही है —धर्म के नाम पर भीड़, और भीड़ के नाम पर वोट।
राजनीति अब यह तय कर रही है कि कौन-सी सड़क पर कौन झुकेगा, कौन चढ़ेगा, और कौन रुकेगा।जबकि सच्चाई यह है —कांवड़ यात्रा चलती है, रुकती नहीं;
नमाज के समय सड़कें रुक जाती हैं, चलती नहीं।पर यह तुलना भी अब तर्क से ज़्यादा, राजनीति की ज़रूरत बन चुकी है।
आज हालत यह है कि कहीं नीली चादर बिछाकर मजार बन जाती है,कहीं मूर्तियाँ लगाकर “हमारी पहचान” घोषित कर दी जाती है।देश के हर कोने में कोई न कोई नया प्रतीक उग आता है,लेकिन असली मुद्दे — सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य — वहीं के वहीं धँसे रहते हैं।
अब वक्त है कि देश तय करे: क्या हमें सड़कों पर पूजा-पाठ और प्रदर्शन चाहिए,
या ऐसी सड़कें चाहिए जो हमें तरक्की तक पहुँचाएँ?
भारत को राजनीतिक प्रतीकों के देश से आगे बढ़कर कर्म, कर्तव्य और क़ानून के देश की ओर लौटना होगा। क्योंकि देश मूर्तियों या चादरों से नहीं, विचारों और व्यवस्था से चलता है।
