February 19, 2026

खनन की धूल नारायणपुर को, मलाई कांकेर को?

डीएमएफ राशि के बंटवारे पर उठा सवाल, जनप्रतिनिधियों का कलेक्टर को ज्ञापन

7 दिन में न्याय नहीं मिला तो खनन कार्य रोकने का अल्टीमेटम

कैलाश सोनी-नारायणपुर, 19 फरवरी 2026। भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) के लिए कच्चा लोहा देने वाली रावघाट परियोजना की खदानें भले ही भौगोलिक रूप से नारायणपुर–कांकेर की सरहद पर हों, लेकिन खनन का वास्तविक बोझ और पर्यावरणीय असर नारायणपुर जिला झेल रहा है। इसके बावजूद जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) की अधिकांश राशि कांकेर जिले को दिए जाने पर नारायणपुर में तीखा असंतोष उभर आया है

इसी मुद्दे को लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष नारायण मरकाम के नेतृत्व में जिले के समस्त जनप्रतिनिधियों का प्रतिनिधिमंडल बुधवार को कलेक्टर से मिला और डीएमएफ राशि के भेदभावपूर्ण वितरण के विरोध में ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधियों ने दो टूक कहा—“जहां खनन, वहां पहला अधिकार।” नारायणपुर की जमीन से निकल रहा लौह अयस्क भिलाई स्टील प्लांट तक पहुंच रहा है, पर खनन से प्रभावित गांव आज भी धूल, प्रदूषण और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।

नारायणपुर में खनन, कांकेर को ज्यादा हिस्सा!

ज्ञापन में बताया गया कि अंजरेल खदान के कुल क्षेत्रफल में 1203.152 हेक्टेयर क्षेत्र नारायणपुर जिले के अंतर्गत आता है, जबकि 825.645 हेक्टेयर क्षेत्र कांकेर जिले में है। विडंबना यह है कि जहां नारायणपुर हिस्से में खनन कार्य सक्रिय रूप से चल रहा है, वहीं कांकेर हिस्से में अभी तक खनन शुरू ही नहीं हुआ। इसके बावजूद रावघाट परियोजना (बीएसपी) द्वारा अब तक लगभग 58 करोड़ रुपये की डीएमएफ राशि कांकेर जिले को प्रदान की जा चुकी है, जबकि नारायणपुर को मात्र 15 करोड़ रुपये ही मिल पाए हैं।

प्रतिनिधियों ने इसे न केवल प्रशासनिक असंतुलन बल्कि खनन प्रभावित क्षेत्र के साथ खुला अन्याय बताया। उनका कहना है कि डीएमएफ का उद्देश्य खनन से प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और आजीविका जैसे बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है, लेकिन नारायणपुर जैसे दूरस्थ आदिवासी बहुल जिले को उसके हिस्से की राशि नहीं मिलने से विकास की रफ्तार थम रही है।

‘जहां असर, वहीं अधिकार’ की अनदेखी

जनप्रतिनिधियों ने यह भी सवाल उठाया कि मातृ जिला–संबंध जिला की प्रशासनिक व्यवस्था के बावजूद जिस जिले में वास्तविक खनन हो रहा है, उसे प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही। भिलाई स्टील प्लांट के खनिपट्टा (माइनिंग लीज) का अनुबंध भी नारायणपुर जिले के माध्यम से निष्पादित किए जाने की मांग उठाई गई, ताकि भविष्य में राजस्व और डीएमएफ राशि के वितरण में पारदर्शिता बनी रहे।

7 दिन का अल्टीमेटम

ज्ञापन में स्पष्ट चेतावनी दी गई कि यदि 7 दिवस के भीतर डीएमएफ की लंबित एवं न्यायोचित राशि का अंतरण नारायणपुर जिले को नहीं किया गया, तो जिले के नागरिक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन करने को विवश होंगे। जरूरत पड़ी तो खनन गतिविधियों को बाधित करने जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं।

भविष्य से जुड़ा सवाल

जनप्रतिनिधियों ने कहा कि खनन से निकलने वाली “धूल” नारायणपुर के हिस्से आ रही है—वन, जलस्रोत, सड़कें और ग्रामीण जीवन प्रभावित हो रहा है—जबकि विकास की “मलाई” दूसरे जिले तक पहुंच रही है। यह स्थिति लंबे समय तक रही तो नारायणपुर का सामाजिक-आर्थिक भविष्य संकट में पड़ सकता है।

ये रहे मौजूद जनप्रतिनिधि

ज्ञापन सौंपने के दौरान जिला पंचायत अध्यक्ष नारायण मरकाम, जनपद पंचायत अध्यक्ष पिंकी उसेंडी, जिला पंचायत सदस्य संतनाथ उसेंडी, शांति नेताम, हीना नाग, सुखयारी सलाम, लता कोर्राम, चैतराम (जनपद उपाध्यक्ष), कुमेटी, लच्छन कांगे, सुकमन उइके (सरपंच), मोतीराम वड्डे, गागरू कोर्राम, भुरवा सलाम, गणेश सोड़ी, रामसाय दुग्गा, लालदाई वड्डे, सुखदू उइके, रैनु सलाम, सोमदेर मंडावी सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

यह मामला केवल जिलों के बीच राशि के बंटवारे का नहीं, बल्कि खनन प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों के अधिकार, पर्यावरणीय न्याय और संतुलित विकास का सवाल है। शासन-प्रशासन को समय रहते हस्तक्षेप कर डीएमएफ राशि का न्यायोचित वितरण सुनिश्चित करना होगा, ताकि नारायणपुर की जमीन से निकले खनिज का लाभ उसी धरती पर बसे लोगों तक पहुंचे।

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