पिछले कुछ वर्षों से मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों और केंद्रीय शिक्षा बोर्डों में 1 अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ करने की व्यवस्था लागू की गई है। हालांकि व्यावहारिक रूप से यह व्यवस्था कई चुनौतियों के कारण प्रभावी रूप से लागू होती दिखाई नहीं देती। अधिकांश क्षेत्रों में अप्रैल माह से ही भीषण गर्मी शुरू हो जाती है, जिसके कारण विद्यालयों में नियमित अध्ययन-अध्यापन प्रभावित होता है और शीघ्र ही ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित करना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में अप्रैल से घोषित नया सत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। जून में विद्यालय खुलने के बाद भी तेज गर्मी और कम उपस्थिति के कारण पढ़ाई व्यवस्थित रूप से संचालित नहीं हो पाती, विशेष रूप से छोटे बच्चों और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
नई सत्र व्यवस्था के अनुरूप सरकारों द्वारा वार्षिक परीक्षाएँ भी पहले आयोजित कराई जाने लगी हैं। कई बोर्डों में परीक्षाएँ जनवरी के अंत या फरवरी में समाप्त हो जाती हैं और परिणाम मार्च-अप्रैल तक जारी कर दिए जाते हैं। इससे विद्यार्थियों को पूरे पाठ्यक्रम के अध्ययन और पुनरावृत्ति के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
इस वर्ष सीबीएसई द्वारा उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन में डिजिटल और स्कैन कॉपी आधारित प्रक्रिया अपनाई गई, जिसको लेकर कुछ छात्रों और अभिभावकों ने मूल्यांकन संबंधी शिकायतें भी उठाईं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी नई प्रक्रियाओं को लागू करने से पहले पर्याप्त प्रशिक्षण और तैयारी आवश्यक होती है।
वर्तमान व्यवस्था का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करना बताया जाता है। इसी कारण विश्वविद्यालयों, मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की समय-सीमा भी पहले निर्धारित की जा रही है। हालांकि शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए विद्यालयों का नियमित सत्र जुलाई से प्रारंभ होना अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
यदि विद्यालय जुलाई से प्रारंभ किए जाएँ और वार्षिक परीक्षाएँ मार्च-अप्रैल में आयोजित हों, तो विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। साथ ही विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया ग्रीष्मावकाश के दौरान संचालित की जा सकती है, जिससे नए सत्र को व्यवस्थित ढंग से शुरू किया जा सके।
भारत जैसे विशाल और विविध जलवायु वाले देश में अप्रैल, मई और जून के महीने अधिकांश क्षेत्रों में अत्यधिक गर्म होते हैं। इसलिए इन महीनों में अवकाश और जुलाई से नियमित शैक्षणिक गतिविधियाँ शुरू करने की व्यवस्था विद्यार्थियों के स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों के लिए अधिक संतुलित मानी जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र और राज्य सरकारों को वर्तमान शैक्षणिक सत्र प्रणाली की समीक्षा कर ऐसी नीति अपनानी चाहिए जो केवल प्रशासनिक सुविधा पर आधारित न होकर विद्यार्थियों की वास्तविक शैक्षणिक आवश्यकताओं और देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप हो।