तीन साल में एक बार आने वाले दुर्लभ महायोग पुरुषोत्तम पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ श्रीहरि विष्णु की असीम कृपा आप पर सदा बनी रहे।

पूर्णमाशी (पूर्णिमा) आस्था और श्रद्धा का पावन दिवस, पूर्णिमा की चाँदनी जीवन में शांति और उजाला लाए।सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।अधिकमास पूर्णिमा का दुर्लभ अवसर* 🙏
सिर्फ 3 साल में एक बार आने वाला अधिकमास, और उसकी सबसे शक्तिशाली पूर्णिमा — पुरुषोत्तम पूर्णिमा ✨
⏳ यह शुभ अवसर सालों बाद आया है।
तीन साल में एक बार आने वाले दुर्लभ महायोग पुरुषोत्तम पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ श्रीहरि विष्णु की असीम कृपा आप पर सदा बनी रहे।
तंबाकू सेवन और धूम्रपान सेहत के लिए बेहद हानिकारक हैं
आइए, इसे त्यागकर एक स्वस्थ जीवन अपनाएँ विश्व तंबाकू निषेध दिवस पे लोगो को जागरुक करे ।
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आज दिनांक 31 मई 2026 ,त्रिकुटा पर्वत” से अद्भुत प्राकृतिक पावन दिव्य पिंडी स्वरूप जगजननी माँ वैष्णोदेवी जी के प्रातः काल श्रृंगार के आलौकिक दर्शन। दर्शन के लिए फोटो अंत तक देखें।
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व्यसन हमारी शक्ति, स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता को धीरे-धीरे कम कर देता है। जब हम आत्म-जागरूकता और आत्म-बल से व्यसनों पर विजय प्राप्त करते हैं, तब मन हल्का होता है और जीवन में वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव होने लगता है।
आज आप अपनी किसी एक निर्भरता को छोड़ने की दिशा में कौन-सा कदम उठाएँगे?
#brahmakumaris
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“इस भौतिक अस्तित्व की क्षणभंगुर, दयनीय अवस्था से विरक्त होना आवश्यक है। और यह कैसे संभव है? यही कहा गया है, ‘मन-मया माम उपाश्रिताः’। ‘मेरे चिंतन में लीन होना और मेरी शरण लेना आवश्यक है।'”
पुरा व्याख्यान सुने 👉
https://vanisource.org/wiki/Lecture_on_BG_4.10_Festival_at_Maison_de_Faubourg_–_Geneva,_May_31,_1974
(श्रील प्रभुपाद,लेक्चर_BG 4.10 ,31 मई 1974, जिनेवा)
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“चूहा अपने आराम से रहने के लिए खेत में बिल बनाता है। आपने खेत में बिल देखे हैं ना? और बड़ा सांप इन्हीं बिलों का फायदा उठाता है। वह उनमें घुसकर चूहे को खा जाता है और आराम से रहता है। इस प्रकार चूहा सांप के लिए आरामदायक जगह बनाता है। सांप का काम ही है अंदर घुसकर आराम से रहना।”
(श्रील प्रभुपाद,31 मई 1974, जिनेवा)
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इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर, आरती, जाप और गुरु पूजा मे आप सभी सादर आमन्त्रित है ।👇
🕗Time : Daily at 4.30 A:M / 7:10 A:M (IST),
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📅 Date : 31st May 2026
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श्रील व्यासदेव ने अपने वेदांत-सूत्र में वर्णन किया है कि सब कुछ भगवान की ऊर्जा का रूपांतरण मात्र है। हालांकि, शंकराचार्य ने यह कहकर दुनिया को गुमराह किया कि व्यासदेव गलत थे। इस प्रकार उन्होंने पूरी दुनिया में ईश्वरवाद के विरुद्ध भीषण विरोध उत्पन्न कर दिया।
भागवतम की कक्षा ।🕗Time : 8 AM Onward Daily.
🗣️Speaker :HG Nama Nistha Das Prabhuji ।
🕉️Shloka No. : CC Adi lila 7.21
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कृपया इस लिंक 👆 का उपयोग करके जुड़ें और श्रवणम के इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाएं।
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✨Hare Krishna ✨
Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 7 Verse 7👇
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय |
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव || ७ ||
मत्तः – मुझसे परे; पर-तरम् – श्रेष्ठ; न – नहीं; अन्यत् किञ्चित् – अन्य कुछ भी; अस्ति – है; धनञ्जय – हे धन के विजेता; मयि – मुझमें; सर्वम् – सब कुछ; इदम् – यह जो हम देखते हैं; प्रोतम् – गुँथा हुआ; सूत्रे – धागों में; मणि-गणाः – मोतियों के दाने; इव – सदृश |
Translation👇
हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है | जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है |
Commentary👇
परमसत्य साकार है या निराकार, इस पर सामान्य विवाद चलता है | जहाँ तक भगवद्गीता का प्रश्न है, परमसत्य तो श्रीभगवान् श्रीकृष्ण हैं और इसकी पुष्टि पद-पद पर होती है | इस श्लोक में विशेष रूप से बल है कि परमसत्य पुरुष रूप है | इस बात की कि भगवान् ही परमसत्य हैं, ब्रह्मसंहिता में भी पुष्टि हुई है – ईश्र्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः – परमसत्य श्रीभगवान् कृष्ण ही हैं, जो आदि पुरुष हैं | समस्त आनन्द के आगार गोविन्द हैं और वे सच्चिदानन्द स्वरूप हैं | ये सब प्रमाण निर्विवाद रूप से प्रमाणित करते हैं कि परं सत्य पुरुष हैं जो समस्त कारणों का कारण हैं | फिर भी निरीश्र्वरवादी श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् में (३.१०) उपलब्ध वैदिक मन्त्र के आधार पर तर्क देते हैं – ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयं | य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति – “भौतिक जगत् में ब्रह्माण्ड के आदि जीव ब्रह्मा को देवताओं, मनुष्यों तथा निम्न प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है | किन्तु ब्रह्मा के परे एक इन्द्रियातीत ब्रह्म है जिसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता और वो समस्त भौतिक कल्मष से रहित होता है | जो व्यक्ति उसे जान लेता है वह भी दिव्य बन जाता है, किन्तु जो उसे नहीं जान पाते, वे सांसारिक दुखों को भोगते रहते हैं |”
निर्विशेषवादी अरूपम् शब्द पर विशेष बल देते हैं | किन्तु यह अरूपम् शब्द निराकार नहीं है | यह दिव्य सच्चिदानन्द स्वरूप का सूचक है , जैसा कि ब्रह्मसंहिता में वर्णित है और ऊपर उद्धृत है | श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् के अन्य श्लोकों (३.८-९) से भी इसकी पुष्टि होती है –
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् |
तमेव विद्वानति मृत्युमति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ||
यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चिद् यस्मान्नाणीयो नो ज्यायोऽति किञ्चित् |
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ||
“मैं उन भगवान् को जानता हूँ जो अंधकार की समस्त भौतिक अनुभूतियों से परे हैं | उनको जानने वाला ही जन्म तथा मृत्यु के बन्धन का उल्लंघन कर सकता है | उस परमपुरुष के इस ज्ञान के अतिरिक्त मोक्ष का कोई अन्य साधन नहीं है |”
“उन परमपुरुष से बढ़कर कोई सत्य नहीं क्योंकि वे श्रेष्ठतम हैं | वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हैं और महान से भी महानतर हैं | वे मूक वृक्ष के समान स्थित हैं और दिव्य आकाश को प्रकाशित करते हैं | जिस प्रकार वृक्ष अपनी जड़ें फैलाता है, ये भी अपनी विस्तृत शक्तियों का प्रसार करते हैं |”
इस श्लोकों से निष्कर्ष निकलता है कि परमसत्य ही श्रीभगवान् हैं, जो अपनी विविध परा-अपरा शक्तियों के द्वारा सर्वव्यापी हैं |
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ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने प्रणतः क्लेश नाशाय गोविंदाय नमो नमः।। ए. सी.भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद और हमारी गुरुपरंपरा की जय हो।”संदर्भ: भगवद् गीता 4.1- 4.3″ क्या आपको पता है अर्जुन से भी पहले भगवत गीता का ज्ञान करोडो वर्ष पहले सूर्य देव को दिया गया था?
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