June 10, 2026

शिक्षक हैं, शिक्षक ही रहने दें: गैर-शैक्षणिक कार्यों का बढ़ता बोझ और शिक्षा व्यवस्था की चुनौती

देश में जनगणना, मतदाता सूची पुनरीक्षण, चुनावी प्रक्रियाएं और अन्य अनेक सरकारी अभियान ऐसे हैं जिनमें शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। हालांकि, लगातार बढ़ती गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों के कारण विद्यालयों की नियमित शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की चिंता भी सामने आ रही है।

हाल के समय में जनगणना और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसे कार्यों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने से कई विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता कम हो गई। कुछ स्थानों पर विद्यालयों में सीमित शिक्षक ही बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि शिक्षकों की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। यदि शिक्षकों को लंबे समय तक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता है, तो इसका प्रभाव नामांकन अभियान, ड्रॉपआउट रोकने के प्रयासों तथा नियमित शिक्षण गतिविधियों पर पड़ सकता है।

भारतीय परंपरा में गुरु को विशेष सम्मान प्राप्त है। शिक्षकों की भूमिका केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक मूल्यों के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

यूडायस (UDISE+) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में करोड़ों विद्यार्थियों की शिक्षा का दायित्व लाखों शिक्षकों पर है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक माना जाता है कि शिक्षक अधिकतम समय शिक्षण कार्य को दे सकें।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के लिए केवल आधारभूत संरचना और योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि शिक्षकों की नियमित उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से यथासंभव मुक्त रखा जाए, तो सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों का भरोसा दोनों मजबूत हो सकते हैं।

यह विषय शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक आवश्यकताओं और सरकारी अभियानों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

Written by

ANAND KUMAR DWIVEDI

District Reporter

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