ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और मध्य-पूर्व (Middle East) में युद्ध की आहट के बीच, ऊर्जा की दुनिया में एक बहुत बड़ी हलचल मची हुई है। एक तरफ दुनिया की नजरें मिसाइलों पर हैं, तो दूसरी तरफ समुद्र के गहरे पानी के नीचे से प्राकृतिक गैस निकालने की होड़ और उसके सामरिक महत्व ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है।
यहाँ इस विषय पर एक विस्तृत लेख दिया गया है:
ईरान युद्ध के साये में ‘नीला सोना’: समुद्र के नीचे से गैस का खेल
मध्य-पूर्व में युद्ध की स्थिति ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसी तनाव के बीच समुद्र के नीचे मौजूद गैस भंडारों (Gas Reserves) को सुरक्षित करने और वहां से उत्पादन जारी रखने की जंग तेज हो गई है।
1. फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और ‘साउथ पार्स’ का महत्व
ईरान और कतर के बीच स्थित ‘साउथ पार्स’ (South Pars) दुनिया का सबसे बड़ा गैस क्षेत्र है।
रणनीतिक स्थिति: यह समुद्र के नीचे स्थित है। ईरान इस क्षेत्र से अपनी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा चलाता है।
युद्ध का खतरा: यदि ईरान और इजरायल के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ता है, तो यह गैस फील्ड सीधे निशाने पर आ सकता है। यहाँ से होने वाली सप्लाई रुकने का मतलब है पूरी दुनिया में बिजली और हीटिंग का संकट।
2. इजरायल का ‘लेवियाथन’ और ‘कैरिश’ फील्ड
इजरायल, जो कभी ऊर्जा के लिए दूसरों पर निर्भर था, अब समुद्र के नीचे से निकलने वाली गैस के दम पर एक ‘एनर्जी पावरहाउस’ बन चुका है।
लेवियाथन (Leviathan): भूमध्य सागर के नीचे स्थित यह गैस फील्ड इजरायल की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ है।
सुरक्षा कवच: युद्ध के दौरान लेवियाथन और कैरिश जैसे गैस प्लेटफार्मों की सुरक्षा के लिए इजरायल ने अपने ‘सी-डोम’ (C-Dome)—जो कि आयरन डोम का समुद्री संस्करण है—को तैनात कर रखा है।
चुनौती प्रभाव
सप्लाई चेन में बाधा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से समुद्री रास्ते से गैस (LNG) का व्यापार ठप हो सकता है।
कीमतों में उछाल युद्ध की एक भी चिंगारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों को 20% से 50% तक बढ़ा सकती है।
बुनियादी ढांचे पर हमला समुद्र के नीचे बिछी पाइपलाइनों को नुकसान पहुँचाना ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ का हिस्सा बन गया है।
3. भारत पर इसका असर
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा कतर और खाड़ी देशों से LNG (Liquefied Natural Gas) के रूप में आयात करता है।
यदि समुद्र के नीचे से निकलने वाली इस गैस की सप्लाई चेन प्रभावित होती है, तो भारत में CNG और PNG की कीमतें बढ़ सकती हैं।
भारत अब अपनी खुद की कंपनियों (जैसे ONGC) को अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में गहरे समुद्र (Deep Sea) में ड्रिलिंग के लिए प्रोत्साहित कर रहा है ताकि खाड़ी देशों पर निर्भरता कम हो सके।
विशेष विश्लेषण:
समुद्र के नीचे छिपी यह गैस केवल ईंधन नहीं, बल्कि एक ‘हथियार’ भी है। ईरान जहाँ इसे अपनी ढाल बना रहा है, वहीं पश्चिमी देश इसे ईरान की आर्थिक घेराबंदी का जरिया मान रहे हैं। युद्ध की स्थिति में समुद्र के नीचे बिछा यह पाइपलाइनों का जाल सबसे संवेदनशील मोर्चा साबित हो सकता है।