(यह लेख लेखिका के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है।)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े जनजाति सुरक्षा मंच और वनवासी कल्याण आश्रम ने हाल ही में दिल्ली में “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” आयोजित किया, जिसमें देशभर से हजारों आदिवासियों की भागीदारी हुई। आयोजन को बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती से जोड़ा गया। समापन अवसर पर आयोजकों ने रेलवे मंत्रालय सहित विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
लेखिका के अनुसार, जनजाति सुरक्षा मंच की प्रमुख मांग यह रही है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) सूची से बाहर किया जाए और उन्हें प्राप्त संवैधानिक लाभ समाप्त किए जाएं। मंच का तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति अपनी आदिवासी पहचान खो देता है।
लेखिका का दावा है कि इस प्रकार की मांगों के कारण कई राज्यों, विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में, ईसाई आदिवासी परिवारों के खिलाफ सामाजिक तनाव और विवाद की घटनाएं सामने आई हैं। लेखिका ने यह भी उल्लेख किया है कि कुछ मामलों में धार्मिक एवं सामाजिक अधिकारों को लेकर न्यायालयों में भी सुनवाई हुई है।
दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में यह विषय हाल के न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में भी उठाया गया। लेखिका का कहना है कि अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक पहचान धर्म से नहीं, बल्कि समुदाय, परंपरा और सामाजिक संबंधों से जुड़ी हुई है। इस संदर्भ में उन्होंने विभिन्न न्यायालयों के पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया है।
लेखिका के अनुसार, आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को लेकर वर्तमान समय में विभिन्न विचारधारात्मक दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। उनका मत है कि आदिवासी समुदायों की परंपराओं, विश्वासों और सांस्कृतिक विशिष्टता को उनके अपने संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
सम्मेलन में बिरसा मुंडा की विरासत का उल्लेख करते हुए कई वक्ताओं ने आदिवासी समुदायों और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के संबंधों पर विचार व्यक्त किए। वहीं लेखिका का मत है कि बिरसा मुंडा के संघर्ष का मूल उद्देश्य औपनिवेशिक शासन और शोषण के खिलाफ प्रतिरोध था तथा उनकी विरासत को उसी ऐतिहासिक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
लेखिका ने यह भी कहा है कि आज आदिवासी समाज के सामने वनाधिकार, ग्रामसभा की शक्तियां, भूमि अधिकार, रोजगार, शिक्षा, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सुविधाएं और जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। उनके अनुसार, इन विषयों पर गंभीर राष्ट्रीय बहस और नीति-निर्माण की आवश्यकता है।
लेखिका का मत है कि आदिवासी समाज की एकता, लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही भविष्य की चुनौतियों का प्रभावी उत्तर हो सकती है। उन्होंने बिरसा मुंडा सहित अन्य आदिवासी नेताओं की विरासत को सामाजिक न्याय और अधिकारों के संघर्ष से जोड़कर देखने की आवश्यकता पर बल दिया है।
(लेखिका माकपा और जनवादी महिला समिति की वरिष्ठ नेत्री तथा राज्यसभा की पूर्व सदस्य हैं।)