🟥 सरकारी अस्पतालों का कड़वा सच — ‘स्टॉक नहीं है’ या सिस्टम की लापरवाही?
“सरकारी अस्पताल की खिड़की पर जब “स्टॉक नहीं है” का बोर्ड लटकता है, तो असल में वह एक गरीब मरीज की आखिरी उम्मीद पर ताला होता है।”
राज्यसभा के बजट सत्र में सांसद राघव चड्ढा ने उसी सच्चाई को आवाज दी, जिसे आम लोग हर रोज सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइनों में खड़े होकर महसूस करते हैं।
देश के कई सरकारी अस्पतालों में मरीजों की शिकायत लगभग एक जैसी है — डॉक्टर पूरी दवा लिखते हैं, लेकिन सरकारी दवाई काउंटर से सिर्फ कुछ सस्ती दवाइयां मिलती हैं। बाकी जरूरी दवाइयों के लिए मरीजों को बाहर के प्राइवेट मेडिकल स्टोर भेज दिया जाता है।
अक्सर जवाब मिलता है — “सप्लाई नहीं आई है”, जबकि सवाल यह है कि आखिर गरीबों के लिए आई मुफ्त दवाइयां जा कहां रही हैं?
👉 क्या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है?
👉 क्या सरकारी दवाइयों की कालाबाजारी हो रही है?
👉 क्या मुफ्त इलाज सिर्फ कागजों तक सीमित है?
गरीब मरीज 200-300 रुपये की दवाई के लिए भी संघर्ष करता है, लेकिन उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं होता। संसद में उठी यह बहस अब आम जनता की बहस बन चुकी है।
💬 क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ ऐसा हुआ है?
अपना अनुभव कमेंट में जरूर लिखें — आपकी आवाज ही बदलाव की शुरुआत है।
✍️ Journalist Anand Kishor
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