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दानापुर से बेगूसराय तक नोटों की सेज: जब 'सप्लाई' और 'रजिस्ट्री' का गठजोड़ बना भ्रष्टाचार का कॉरपोरेट मॉडल,

By VIJAY KUMAR • 2026-10-01 04:19 • 2 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
दानापुर से बेगूसराय तक नोटों की सेज:  जब 'सप्लाई' और 'रजिस्ट्री' का गठजोड़ बना भ्रष्टाचार का कॉरपोरेट मॉडल,

विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ,

पटना : ​व्यवस्था के भीतर दीमक बनकर बैठे भ्रष्ट तंत्र का चेहरा जब भी बेनकाब होता है, तो वह केवल फाइलों का आंकड़ा भर नहीं होता, बल्कि आम जनता के हक और भरोसे का नंगा कत्ल होता है।
बिहार के प्रशासनिक हलके में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो द्वारा हालिया उजागर किया गया मामला किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
एक तरफ जिले के खाद्यान्न और आपूर्ति की कमान संभाल रहे एडीएम रविन्द्र कुमार दिवाकर और दूसरी तरफ जमीन की रजिस्ट्री पर मुहर लगाने वाली उनकी पत्नी दानापुर की सब-रजिस्ट्रार कुमारी स्वीटी।
जब सत्ता और अधिकार के दो सबसे मलाईदार विभाग एक ही छत के नीचे आ जाएं, तो परिणाम वही होता है जो आज सामने है—मेज पर सजी 500-500 के नोटों की थपियां, 48 ब्रांडेड घड़ियां और करोड़ों की बेनामी संपत्तियां।

​कागजों पर 35 हजार, घर में 80 लाख:
​इस पूरे कांड का सबसे घिनौना और हास्यास्पद पहलू वह हलफनामा है जो इन साहब ने सिस्टम की आंखों में धूल झोंकने के लिए दाखिल किया था।
संपत्ति विवरण में बताया गया कि बैंक में मात्र 35 हजार रुपये नकद हैं और 33.50 लाख रुपये का होम लोन चल रहा है।
यानी कागजों में खुद को 'कर्जदार' और लाचार दिखाने की पूरी कोशिश की गई। लेकिन जब निगरानी की टीम ने दानापुर के कश्यप ग्रीन होम्स और बेगूसराय में दस्तक दी, तो अलमारियों और गद्दों से नोटों के फव्वारे फूट पड़े।
लगभग 80 लाख रुपये नकद गिनने के लिए मशीनें बुलानी पड़ीं। क्या एक लोक सेवक की जवाबदेही का यही पैमाना रह गया है?

​अकूत संपत्ति और 'वक्त' का अजीब शौक :
​जांच में जो ब्यौरा सामने आया है, वह आंखें चौंधियाने वाला है। दानापुर में दो-दो लग्जरी फ्लैट, फुलवारी शरीफ और बेगूसराय में आधा दर्जन से ज्यादा कीमती भूखंड और 52 लाख रुपये से अधिक के सोने-हीरे के आभूषण।
लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाला खुलासा रहा—विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और लग्जरी कंपनियों की 48 कलाई घड़ियां, जिनकी अनुमानित कीमत 6 लाख रुपये से अधिक आंकी गई है।
विडंबना देखिए, जिस अफसर के पास वक्त देखने के लिए 48 घड़ियां थीं, उसने शायद यह नहीं सोचा था कि कानून का पहिया जब घूमता है, तो भ्रष्टाचारियों का 'बुरा वक्त' किसी घड़ी का मोहताज नहीं होता।

​सप्लाई से रजिस्ट्री तक: सिंडिकेट का पर्दाफाश,
​यह केवल एक व्यक्ति का भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि विभाग-दर-विभाग फैले नेक्सस का परिणाम है।
आपूर्ति विभाग का काम गरीबों के राशन, पीडीएस और खाद्यान्न सुरक्षा की निगरानी करना है, वहीं निबंधन विभाग सीधे तौर पर जमीन और रियल एस्टेट से जुड़ा है।
जब इन दोनों संवेदनशील पदों पर आसीन पति-पत्नी अपने पद का इस्तेमाल जनसेवा की बजाय निजी तिजोरी भरने के लिए करने लगें, तो व्यवस्था का दम घुटना लाजिमी है।

​सवाल जो व्यवस्था से पूछे जाने चाहिए:
​सालाना संपत्ति जांच की औपचारिकता कब तक?
जो अफसर हलफनामे में कर्जदार बन रहे हैं, उनके बैंक खातों और जीवनशैली का आंतरिक ऑडिट समय रहते क्यों नहीं होता?
​सजा या सिर्फ तबादला?

ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि निलंबन के कुछ महीनों बाद आरोपी कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाकर पुनः मुख्यधारा में आ जाते हैं।
क्या इस बार 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' और नई बीएनएस धाराओं के तहत संपत्ति जब्ती और त्वरित ट्रायल सुनिश्चित होगा?

​सिस्टम की निगरानी पर जनता का भरोसा:
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने हेल्पलाइन और संपर्क नंबर जारी कर सराहनीय पहल की है, लेकिन असली जीत तभी होगी जब इस तरह की काली कमाई को राजसात कर लोकहित में लगाया जाए।

​निष्कर्ष :
​रविन्द्र कुमार दिवाकर और कुमारी स्वीटी का मामला पूरे प्रशासनिक तंत्र के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि अगर निगरानी और जवाबदेही की लगाम ढीली पड़ी, तो लोकसेवक 'जनता के सेवक' नहीं, बल्कि 'व्यवस्था के भक्षक' बन जाते हैं।
अब निगाहें न्यायपालिका और विशेष निगरानी अदालत पर हैं कि इस खुली लूट के खिलाफ नजीर पेश करने वाली कार्रवाई कब तक अमल में लाई जाती है।

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