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"कलम के दो सिपाही रुखसत, मगर उनकी बेबाक आवाज हमेशा गूंजती रहेगी"

By VIJAY KUMAR • 2026-10-03 04:02 • 2 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
"कलम के दो सिपाही रुखसत, मगर उनकी बेबाक आवाज हमेशा गूंजती रहेगी"

लेखक : विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
2 अक्टूबर 2026,
​गयाजी / गयाजी की पावन और ऐतिहासिक धरती के गांधी मंडप में पसरा सन्नाटा किसी सामान्य शोक का नहीं, बल्कि उस पीड़ा का परिचायक था जब सच लिखने वाली दो मजबूत उंगलियां हमेशा के लिए खामोश हो जाती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार स्व. देवब्रत मंडल और स्व. रामजी सिंह शर्मा के आकस्मिक निधन ने केवल मगध के पत्रकारिता जगत को ही नहीं, बल्कि आम जनता के हक की लड़ाई लड़ने वाले उस हर मंच को सूना कर दिया है जो निष्पक्षता की बुनियाद पर खड़ा था।

​गांधी मंडप में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में जब स्थानीय पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सिर झुकाकर मौन धारण किया, तो वह केवल रस्म अदायगी नहीं थी, बल्कि पत्रकारिता के उस स्वर्णिम दौर को नमन था जिसने सत्ता और व्यवस्था के आगे कभी घुटने नहीं टेके।

​सच्चाई, सरोकार और ज़मीनी रिपोर्टिंग की मिसाल
​दैनिक जागरण के शुरुआती दौर से लेकर डिजिटल युग में ‘मगध लाइव’ की स्थापना और संचालन तक, स्व. देवब्रत मंडल ने यह सिद्ध किया कि संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन पत्रकार की रीढ़ कभी कमजोर नहीं होनी चाहिए।
चाहे नगर निगम की खामियों को उजागर करना हो, रेलवे के बड़े हादसों की जमीनी हकीकत दिखाना हो या दबे-कुचले तबके की आवाज बनना—उनकी लेखनी ने हमेशा "सच के पक्ष" में खड़े होने का धर्म निभाया।

​वहीं, स्व. रामजी सिंह शर्मा ने अपने पूरे जीवन में पत्रकारिता की शुचिता, निष्पक्षता और मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा। दोनों ही कलमकारों ने कभी खबर को टीआरपी या निजी स्वार्थ का जरिया नहीं बनाया, बल्कि खबर को आम इंसान की जिंदगी से जुड़े एक गंभीर सवाल के तौर पर देखा।

​आज के दौर में क्यों सबसे बड़ी क्षति है यह?
​वर्तमान समय में जब पत्रकारिता पर प्रायोजित और एकतरफा होने के आरोप आम हो चले हैं, तब देवब्रत मंडल और रामजी सिंह शर्मा जैसे निष्पक्ष पहरुओं का चले जाना उस खाई को और गहरा कर देता है, जिसे भरना लगभग नामुमकिन है।
वे सिर्फ रिपोर्टर या संपादक नहीं थे; वे नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए चलती-फिरती पाठशाला थे।

​सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी?
​गांधी मंडप में अर्पित किए गए फूल और नम आंखें तभी सार्थक होंगी जब आने वाली पीढ़ी उनकी बेबाक और निर्भीक पत्रकारिता की मशाल को बुझने न दे।

सत्ता के गलियारों में सवाल पूछने का साहस, आम जन के आंसुओं को शब्दों में ढालने की संवेदना और खबर की प्रामाणिकता से कोई समझौता न करना ही इन दोनों महान पत्रकारों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

​अलविदा कलम के सिपाहियों! आपकी देह भले ही पंचतत्व में विलीन हो गई हो, लेकिन आपके शब्द और तेवर मगध की फिजाओं में सदैव जिंदा रहेंगे।

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