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धम्म चेतना से सामाजिक पुनर्जागरण: हरदवन में बुद्ध विहार निर्माण और पंचशील का शंखनाद,

By VIJAY KUMAR • 2026-10-05 05:20 • 3 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
धम्म चेतना से सामाजिक पुनर्जागरण: हरदवन में बुद्ध विहार निर्माण और पंचशील का शंखनाद,

विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
3अक्टूबर 2026,
डोभी (गया) : सभ्यता और संस्कृति के इतिहास में वही समाज जीवित और सशक्त रहता है, जो अपनी जड़ों, वैज्ञानिक चेतना और मानवीय मूल्यों को पहचानता है।

बिहार की पावन धरती, जहाँ कभी तथागत बुद्ध के विचारों ने समता और करुणा का मार्ग प्रशस्त किया था, आज उसी विरासत को ग्रामीण भारत के आँगन में पुनर्जीवित होते देखना एक सामाजिक क्रांति का संकेत है।
डोभी प्रखंड के ग्राम हरदवन के पंचायत भवन प्रांगण में 03 अक्टूबर 2026 को संपन्न हुई बैठक केवल ईंट-गारे से 'बुद्ध विहार' बनाने की औपचारिक शुरुआत नहीं है, बल्कि यह पाखंड, अशिक्षा और कुरीतियों के विरुद्ध प्रज्ञा, शील और करुणा का खुला उद्घोष है।

मंदिर केवल आस्था नहीं, चेतना का केंद्र:
बुद्ध विहार की वास्तविक संकल्पना,
हमारे समाज में अक्सर धार्मिक स्थलों को अंधविश्वास और कर्मकांड के संकीर्ण दायरे में सीमित कर दिया जाता है।
इसके विपरीत, हरदवन में बनने वाला 'विनय धर अर्हत उपाली बुद्ध विहार' शिक्षा, संस्कार और वैचारिक मुक्ति की प्रयोगशाला के रूप में परिकल्पित किया जा रहा है।

बैठक के हस्ताक्षरित प्रस्ताव में यह स्पष्ट संकल्प लिया गया कि विहार निर्माण के उपरांत यहाँ नौनिहालों को नैतिक प्रशिक्षण, आधुनिक शिक्षा और प्रबुद्ध संस्कार दिए जाएंगे। यह दृष्टिकोण साबित करता है कि जब समाज अपने संसाधनों को पाखंड के बजाय बच्चों के भविष्य निर्माण में लगाता है, तभी सच्चे अर्थों में राष्ट्र निर्माण संभव होता है।

पंचशील:
व्यक्तिगत आचरण से व्यवस्था परिवर्तन का सेतु,
सभा में भंते उपाली (सूर्यदेव शास्त्री) के मुख से गूंजे पंचशील के वचन केवल पालि गाथाएँ नहीं, बल्कि आज के संकटग्रस्त समाज की वास्तविक औषधि हैं।

अहिंसा और जीवन रक्षा:
हर जीव के प्रति करुणा और अकारण हिंसा का निषेध।

अस्तेय: बिना अधिकार दूसरों की संपत्ति या हक पर कुदृष्टि न डालना।

सदाचार: नारी शक्ति के प्रति सम्मान, मर्यादा और सुरक्षित समाज की रचना।

सत्य: वाणी की शुद्धि, झूठी गवाही, चुगली और कटुता का पूर्ण त्याग।

नशामुक्ति:
मद्यपान, बीड़ी, तंबाकू और गुटखे से मुक्ति, जो गरीब परिवारों को आर्थिक व शारीरिक रूप से खोखला कर रही हैं।
सैकड़ों वर्षों से यह आचरण घरों के भीतर अनौपचारिक रूप से मौजूद रहा है, किंतु जब इसे सामूहिक संकल्प का रूप दिया जाता है, तो यह सामाजिक बुराइयों पर सीधा प्रहार करता है।

समावेशी नेतृत्व:
बिखरे समाज की एकजुटता,
इस सभा की सबसे बड़ी शक्ति इसकी सामाजिक संरचना में परिलक्षित होती है। एडवोकेट के. के. बौद्ध की उपस्थिति और 21 सदस्यीय समिति में
भंते उपाली, सुरेश प्रसाद, दुधेश्वर यादव, रामभजन यादव, संजय कुमार दास, पिंटू कुमार, भगत यादव, रामो देवी उर्फ रमनी देवी, इन्द्रदेव ठाकुर, रामचरण प्रसाद, मोती महतो, शिवनन्दन महतो, रामजी दास आदि की सामूहिक भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि बुद्ध और बाबा साहेब का मार्ग किसी जाति विशेष का नहीं, बल्कि संपूर्ण वंचित और प्रबुद्ध समाज की साझा चेतना है।

सामूहिक नेतृत्व और निरंतर बैठकों का यह ढाँचा समाज में आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही को मजबूत करता है।

हरदवन की इस पहल ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—भविष्य अंधविश्वास में नहीं, तथागत बुद्ध की प्रज्ञा और बाबा साहेब के शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो के मंत्र में है।
यदि हर गाँव बुद्ध विहारों को शिक्षा, संस्कार और न्याय का केंद्र बनाने की इस राह पर चल पड़े, तो सामाजिक समता और नशामुक्त भारत का सपना कागजों से निकलकर यथार्थ की ठोस जमीन पर उतर आएगा। यह कदम ग्रामीण भारत में वैचारिक मुक्ति के एक नए युग का स्पष्ट संकेत है।

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