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भारत में सिविक सेंस की कमी — सिर्फ शिकायत नहीं, समाधान भी सोचें

By SANDEEP SHARMA • 2026-09-24 05:05 • 1 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
भारत में सिविक सेंस की कमी — सिर्फ शिकायत नहीं, समाधान भी सोचें

भारत में सिविक सेंस, साक्षरता और शिक्षा: समस्या कहां है और बदलाव कैसे आएगा?

सार्वजनिक जगहों पर गंदगी, साक्षरता और शिक्षा की गुणवत्ता भारत में लंबे समय से चर्चा के विषय रहे हैं। इन तीनों मुद्दों को केवल सरकारी योजनाओं या कानूनों से नहीं देखा जा सकता। नागरिक व्यवहार, शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक क्रियान्वयन और सामाजिक भागीदारी—सभी की इसमें भूमिका है।

क्या भारत दुनिया का सबसे गंदा देश है?

भारत को “दुनिया का नंबर वन सबसे गंदा देश” बताने वाली सोशल मीडिया पोस्ट के लिए कोई एक सार्वभौमिक और विश्वसनीय वैश्विक रैंकिंग आधार नहीं है। हालांकि, सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकना और स्वच्छता संबंधी चुनौतियां भारत के कई हिस्सों में वास्तविक समस्या हैं।

स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर शौचालय निर्माण और स्वच्छता सुविधाओं पर काम हुआ है। मिशन के मौजूदा चरण में ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन के साथ-साथ व्यवहार परिवर्तन पर भी जोर दिया जा रहा है। सरकारी मिशन दस्तावेजों में व्यवहार परिवर्तन को कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।

सिविक सेंस की समस्या कहां से आती है?

सार्वजनिक स्वच्छता केवल सफाई कर्मचारियों या स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिकों का व्यवहार भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। घर के भीतर सफाई रखने और सार्वजनिक स्थानों को साझा जिम्मेदारी मानने के बीच अंतर दिखाई दे सकता है।

इसमें परिवार, स्कूल, स्थानीय प्रशासन और समुदाय सभी की भूमिका हो सकती है। केवल जुर्माना लगाने से स्थायी बदलाव की गारंटी नहीं होती; जागरूकता, सुविधा, निगरानी और लगातार नियमों का पालन भी जरूरी है।

क्या सख्त कानून से फर्क पड़ता है?

सिंगापुर इसका एक उदाहरण है, जहां सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकने के खिलाफ जुर्माने और Corrective Work Order जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं। वहां National Environment Agency के अनुसार 2026 की पहली छमाही में जमीन पर कूड़ा फेंकने के मामलों में लगभग 5,300 जुर्माने और 260 से अधिक Corrective Work Orders जारी किए गए।

इससे यह जरूर दिखता है कि नियमों के साथ लगातार निगरानी और प्रवर्तन भी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि भारत और सिंगापुर की आबादी, प्रशासनिक ढांचे और स्थानीय परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए किसी एक मॉडल को सीधे दूसरे देश पर लागू करना उचित नहीं होगा।

100 प्रतिशत साक्षरता कितनी दूर है?

भारत में साक्षरता दर पिछले दशकों में बढ़ी है, लेकिन “100 प्रतिशत साक्षरता” का लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ है। सरकारी PLFS रिपोर्ट में राज्य और केंद्रशासित प्रदेश स्तर पर साक्षरता में पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर भी दर्ज किया गया है। इसलिए केवल राष्ट्रीय औसत देखने के बजाय क्षेत्र, लिंग और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार अंतर को देखना अधिक उपयोगी है।

100 प्रतिशत साक्षरता के लिए बच्चों के स्कूल में प्रवेश के साथ-साथ उनकी निरंतर उपस्थिति, पढ़ाई पूरी करना और वयस्कों की साक्षरता पर भी ध्यान देना जरूरी है। गरीबी, स्कूल छोड़ना और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां कुछ क्षेत्रों में शिक्षा की निरंतरता को प्रभावित कर सकती हैं।

क्या भारतीय शिक्षा पिछले 25 वर्षों में नीचे गई है?

पूरे भारतीय शिक्षा तंत्र के बारे में यह कहना कि वह “बॉटम पर पहुंच गया है”, उपलब्ध आंकड़ों से सीधे साबित नहीं होता। तस्वीर मिश्रित है। स्कूलों में नामांकन और साक्षरता में दीर्घकालिक विस्तार हुआ है, लेकिन सीखने के परिणामों को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं।

ASER 2024 के अनुसार ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के 48.8 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पा रहे थे। 2014 में यह आंकड़ा 48 प्रतिशत था। हालांकि 2022 के 42.8 प्रतिशत की तुलना में 2024 में सुधार दर्ज हुआ। कक्षा 3 में भी 2024 में कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पाने वाले बच्चों का अनुपात 27.1 प्रतिशत रहा।

ASER 2024 ने यह भी दर्ज किया कि 2022 के बाद सरकारी स्कूलों में सभी प्राथमिक कक्षाओं के बुनियादी पढ़ने के स्तर में सुधार हुआ। इसलिए मौजूदा स्थिति को केवल गिरावट के रूप में देखना आंकड़ों की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता।

आगे की चुनौती क्या है?

साक्षरता और शिक्षा की गुणवत्ता को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखने के बजाय उन्हें एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में समझना जरूरी है। बच्चा स्कूल पहुंच रहा है या नहीं, वह स्कूल में बना हुआ है या नहीं और वह अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने-लिखने तथा गणित की बुनियादी क्षमता हासिल कर रहा है या नहीं—इन सभी पहलुओं पर समान ध्यान देना होगा।

सिविक सेंस के मामले में भी यही बात लागू होती है। सार्वजनिक स्थानों को साफ रखना, कूड़ा उचित स्थान पर डालना और सामुदायिक संसाधनों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार का भी विषय है।

निष्कर्ष

सिविक सेंस, साक्षरता और शिक्षा की गुणवत्ता एक-दूसरे से पूरी तरह अलग मुद्दे नहीं हैं। स्कूल और परिवार बच्चों में जिम्मेदार नागरिक व्यवहार की आदतें विकसित करने में भूमिका निभा सकते हैं, जबकि प्रशासन को सुविधाएं, निगरानी और नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।

भारत में स्वच्छता और शिक्षा के क्षेत्र में कई स्तरों पर प्रगति हुई है, लेकिन व्यवहार परिवर्तन और सीखने के परिणामों में सुधार की चुनौती अभी बनी हुई है। इसलिए समाधान केवल अधिक कानून बनाने में नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक भागीदारी, प्रशासनिक व्यवस्था और लगातार क्रियान्वयन को साथ लेकर चलने में है।

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