जनता दरबार — केवल औपचारिकता या जवाबदेह सुशासन का आईना? फाइलों की धूल झाड़ती जनता की गुहार: जब 'हाकिम' के सामने उतरी व्यवस्था की हकीकत,
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गया जी: लोकतंत्र की आत्मा इस बात में निहित है कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज़ सत्ता के शीर्ष गलियारों तक कितनी जल्दी और कितनी गंभीरता से पहुंचती है।
समाहरणालय के सभागार में जिलाधिकारी शशांक शुभंकर के समक्ष उमड़ी फरियादियों की कतारें केवल शिकायतों का पुलिंदा नहीं थीं, बल्कि वे जमीनी प्रशासनिक तंत्र की उन चुनौतियों को भी सामने रखती हैं, जिनके कारण आम नागरिक को ब्लॉक और अंचल के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
1. ब्लॉक स्तर की कार्यप्रणाली का संकेत :
जब 50 से अधिक नागरिक अपनी जमीन की पैमाइश, दाखिल-खारिज, वृद्धावस्था पेंशन या आवास संबंधी समस्याओं के लिए जिलाधिकारी के समक्ष पहुंचते हैं, तो यह ब्लॉक और अंचल स्तर की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
यदि निचले स्तर पर 'लोक सेवाओं का अधिकार' (RTPS) के तहत सेवाएं समय पर उपलब्ध हों, तो किसी वृद्ध अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को जिला मुख्यालय तक आने की आवश्यकता कम हो सकती है।
2. 'ऑन द स्पॉट' एक्शन: समाधान की उम्मीद
इस जनता दरबार की अहम बात रही—"मुद्दों पर टालमटोल नहीं, सीधे समाधान"। जिलाधिकारी द्वारा फाइलों को केवल अग्रेषित करने के बजाय मौके पर ही आवश्यक कार्रवाई के निर्देश देना प्रशासनिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक कदम माना जा सकता है। साथ ही, उपस्थित अधिकारियों को समयबद्ध और निष्पक्ष निष्पादन की हिदायत दी गई।
3. भूमि विवाद और जनकल्याणकारी योजनाओं से जुड़े मामले :
दरबार में सामने आए मामलों का बड़ा हिस्सा भूमि विवाद, पेंशन और आवास योजनाओं से संबंधित था। बिहार के परिप्रेक्ष्य में भूमि विवाद लंबे समय से प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती रहे हैं।
जब जिला दंडाधिकारी स्वयं इन प्रकरणों की समीक्षा कर राजस्व अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हैं, तो इससे मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को गति मिलने के साथ संभावित विवादों को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
4. संवाद से सहभागिता: जनता का बहाल होता भरोसा
प्रशासन और नागरिक के बीच सीधा संवाद सुशासन की प्रक्रिया को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गया जिला प्रशासन द्वारा अपनाया गया सक्रिय रुख यह दर्शाता है कि प्रभावी नेतृत्व और समयबद्ध कार्रवाई से प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष:
गया का यह जनता दरबार महज एक प्रशासनिक दिनचर्या नहीं, बल्कि नागरिकों की समस्याओं को सीधे प्रशासन के समक्ष रखने का मंच बना।
अब सबसे बड़ी कसौटी यह होगी कि जिन मामलों में अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं, उनकी समीक्षा किस गति और प्रभावी तरीके से की जाती है।
जनता दरबार की सार्थकता केवल आवेदनों की संख्या गिनने में नहीं, बल्कि समस्याओं के प्रभावी समाधान और लंबित मामलों को कम करने में है।