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लालबत्ती का मोह नहीं, लोकसेवा का जुनून: FCI की नौकरी ठुकराकर IAS बनने वाले जतिन कुमार की संघर्ष-गाथा,

By VIJAY KUMAR • 2026-10-05 05:21 • 2 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
लालबत्ती का मोह नहीं, लोकसेवा का जुनून:  FCI की नौकरी ठुकराकर IAS बनने वाले जतिन कुमार की संघर्ष-गाथा,

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लेखक : विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
3अक्टूबर 2026,
शेरघाटी (गया)​ : भारत के ग्रामीण और कस्बाई परिवेश में सरकारी नौकरी केवल आजीविका का साधन नहीं होती; यह पूरे परिवार के लिए सामाजिक सुरक्षा, प्रतिष्ठा और स्थिरता की अंतिम छत मानी जाती है।

ऐसे समाज में यदि कोई नौजवान हाथ आई स्थायी सरकारी नौकरी को सिर्फ इसलिए छोड़ दे कि उसे देश की सबसे कठिन परीक्षा के जरिए व्यवस्था के शीर्ष पर बैठकर बदलाव लाना है, तो यह साधारण फैसला नहीं बल्कि एक वैचारिक क्रांति है।

राजस्थान के अलवर जिले के एक छोटे से गांव बहरोज से निकलकर बिहार के शेरघाटी में अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) की कुर्सी तक पहुंचे आईएएस अधिकारी जतिन कुमार की कहानी इसी साहसिक फैसले और अदम्य जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज है।

​1. विरासत में मिली मेहनत, रगों में दौड़ा संकल्प :
​जतिन कुमार का प्रशासनिक सेवा में चयन किसी विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि का परिणाम नहीं है।
उनके दादा जी मजदूरी और घर बनाने वाले मिस्त्री का काम करते थे, पिता एक साधारण शिक्षक हैं और मां ने सादगी से घर को संभाला।
अभावों के बीच पले-बढ़े जतिन के भीतर मेहनत का यह संस्कार पैतृक पूंजी के रूप में दर्ज था। परिवार ने हमेशा उन्हें उड़ने का हौसला दिया।

जब जतिन भारतीय खाद्य निगम (FCI) में नौकरी कर रहे थे, तो मध्यमवर्गीय सोच के हिसाब से जीवन ‘सुरक्षित’ हो चुका था।
लेकिन जतिन की आंखों में व्यवस्था के भीतर जाकर नीतियां बदलने का सपना तैर रहा था।

​2. पांच अंकों की विफलता और नौकरी से इस्तीफे का 'कैलकुलेटेड रिस्क' :
​अपने पहले गंभीर प्रयास में जब वे अंतिम सफलता से महज पांच अंकों से चूके, तो सामान्य व्यक्ति समझौता कर लेता है।
लेकिन जतिन ने उस असफलता को अंत नहीं, बल्कि अपनी तैयारी की धार परखने का जरिया बनाया। उन्होंने समझा कि दफ्तर की व्यस्त फाइलों और 9 से 5 की ड्यूटी के बीच UPSC के अथाह पाठ्यक्रम को साधना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है।

​यहीं पर परिवार की भूमिका सबसे प्रेरक बनकर सामने आई। वायुसेना में तैनात भाई के अटूट भरोसे ने उन्हें वह साहस दिया, जिसकी कल्पना भी एक आम युवा करने से डरता है।
जतिन ने FCI की पक्की नौकरी से इस्तीफा दिया और खुद को 10-12 घंटे की किताबों की तपस्या में झोंक दिया।

​3. कोचिंग सिंडिकेट पर डिजिटल आत्मनिर्भरता का तमाचा :
​महानगरों में चल रहे करोड़ों के कोचिंग उद्योग ने यह मिथक गढ़ दिया है कि जब तक लाखों रुपये खर्च नहीं होंगे, तब तक कोई आईएएस नहीं बन सकता। जतिन कुमार की सफलता इस मिथक पर करारा तमाचा है।

उन्होंने किसी लक्जरी कोचिंग संस्थान के जाल में फंसने के बजाय इंटरनेट की दुनिया को अपनी लाइब्रेरी बनाया, यूट्यूब और ऑनलाइन अध्ययन सामग्री को हथियार बनाया और हिंदी माध्यम से 364वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि परीक्षा 'संसाधनों' से नहीं, बल्कि 'संकल्प' से जीती जाती है।

​4. शेरघाटी की जनता और संवेदनशील प्रशासन की उम्मीद :
​आज जब जतिन कुमार गया जिले के ऐतिहासिक व संवेदनशील अनुमंडल शेरघाटी में SDM के रूप में प्रशासनिक बागडोर संभाल रहे हैं, तो आम जनता की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से उनसे जुड़ जाती हैं।
एक ऐसा अधिकारी जिसने खुद गांव की पगडंडियों, मजदूर परिवार के पसीने और बेरोजगारी के जोखिम को झेला हो, उसकी कलम जब किसी गरीब की अर्जी पर चलेगी, तो उसमें संवेदनशीलता और न्याय का संतुलन अपने आप नजर आएगा।
शेरघाटी जैसे अनुमंडल को आज ऐसे ही युवा, ऊर्जावान और जमीनी हकीकत समझने वाले नेतृत्व की आवश्यकता है।

​निष्कर्ष: युवाओं के लिए पथ-प्रदर्शक :
​जतिन कुमार की यह यात्रा देश भर के उन लाखों युवाओं के नाम एक खुला पैगाम है, जो सीमित संसाधनों, भाषा की दीवार या शुरुआती असफलताओं से घबराकर अपने सपनों को दफन कर देते हैं।

असफलता किसी यात्रा का पूर्णविराम नहीं, बल्कि एक अल्पविराम होती है। यदि लक्ष्य के प्रति ईमानदारी हो, जोखिम उठाने का माद्दा हो और मेहनत में खोट न हो, तो बहरोज जैसे किसी भी अनजान गांव से निकलकर देश के प्रशासनिक क्षितिज पर चमकना मुमकिन है।
शेरघाटी के नए अनुमंडल पदाधिकारी की यह दास्तान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा यह याद दिलाती रहेगी कि—मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके हौसलों में जान होती है।

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