नोटिस का ‘खेल’ और घूसखोरी का जाल: बेगूसराय में निगरानी की चोट,
लेखक: विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
6 अक्टूबर 2026
पटना / बेगूसराय : सरकारी तंत्र में जब नियमों का डर दिखाकर जनता पर अनावश्यक दबाव बनाया जाए, तो वह व्यवस्था लोक कल्याणकारी होने के बजाय शोषणकारी प्रतीत होने लगती है।
बेगूसराय अंचल के राज्यकर (वाणिज्य कर) कार्यालय में प्रकाश चन्द्र मोहन (सहायक आयुक्त) और संतोष कुमार झा (डाटा एंट्री ऑपरेटर) की गिरफ्तारी इस मामले में गंभीर सवाल खड़े करती है।
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने 25 हजार रुपये की कथित रिश्वत के मामले में दोनों को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई नोटिस का दबाव बनाकर कथित रूप से वसूली की कोशिश से जुड़े सवालों को भी सामने लाती है।
नियम बनाम उत्पीड़न:
नोटिस निपटारे के बाद भी दबाव,
इस पूरे मामले की सबसे गंभीर बात यह है कि परिवादी द्वारा नोटिस का विधिवत निपटारा किए जाने के बावजूद अधिकारियों द्वारा लगातार तीन नोटिस भेजकर कार्रवाई का दबाव बनाए जाने की बात सामने आई है।
यह मामला इस सवाल को सामने लाता है कि टैक्स अनुपालन की आड़ में प्रक्रियात्मक जटिलताओं का कहीं अनुचित इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा था।
जब एक व्यापारी या नागरिक प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद सुरक्षित महसूस नहीं करता, तो यह कर प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अफसर और ऑपरेटर की भूमिका पर सवाल:
सरकारी महकमों में रिश्वतखोरी के मामलों में अधिकारियों और अधीनस्थ कर्मचारियों की कथित भूमिका कई बार सवालों के घेरे में आती रही है।
ऐसे मामलों में यह भी जांच का विषय होता है कि लेन-देन में किन लोगों की क्या भूमिका रही और किस स्तर पर इसकी जिम्मेदारी तय होती है।
बेगूसराय का यह मामला भी अधिकारी और अधीनस्थ कर्मचारी की कथित भूमिका को लेकर सवाल खड़े करता है। ऐसे मामलों का असर न केवल कार्यस्थल की कार्यसंस्कृति पर पड़ता है, बल्कि शासन के सुशासन के दावों पर भी सवाल उठते हैं।
निगरानी ब्यूरो का शतक और व्यवस्थागत सवाल :
प्रेस विज्ञप्ति के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2026 में अब तक निगरानी ब्यूरो 106 ट्रैप मामलों में 107 से अधिक लोक सेवकों को रंगे हाथ गिरफ्तार कर चुका है।
आंकड़े कार्रवाई की सक्रियता तो दर्शाते हैं, लेकिन यह प्रश्न भी खड़ा करते हैं कि हर साल बड़ी संख्या में गिरफ्तारियों के बाद भी रिश्वतखोरी की यह प्रवृत्ति क्यों नहीं रुक रही?
जब तक सजा की दर (Conviction Rate) में सुधार और सेवा से निष्कासन जैसी कठोर कार्रवाई के प्रभावी उदाहरण सामने नहीं आएंगे, तब तक ट्रैप की कार्रवाई के बावजूद रिश्वतखोरी पर पूरी तरह अंकुश लगाना चुनौती बना रहेगा।
निष्कर्ष :
बेगूसराय की यह कार्रवाई केवल दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कर प्रशासन में भ्रष्टाचार की शिकायतों और उससे जुड़े व्यापक सवालों को सामने लाती है।
नागरिकों का यह दायित्व है कि वे भयमुक्त होकर ऐसी प्रताड़ना के खिलाफ आवाज उठाएं और विजिलेंस जैसी संस्थाओं की मदद लें। साथ ही, शासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि टैक्स असेसमेंट और नोटिस जारी करने की पूरी प्रक्रिया 'फेसलेस' और पारदर्शी हो, ताकि किसी भी अधिकारी द्वारा अपने पद या अधिकार का अनुचित इस्तेमाल न किया जा सके।