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'संस्कार' या 'मजदूरी'? जब झाड़ू उठाने पर शिक्षक नपते हैं और समाज नागरिक बोध भूलता है!

By VIJAY KUMAR • 2026-10-03 09:24 • 9 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
'संस्कार' या 'मजदूरी'?  जब झाड़ू उठाने पर शिक्षक नपते हैं और समाज नागरिक बोध भूलता है!

स्कूलों में सफाई और बच्चों की जिम्मेदारी: श्रम की गरिमा और बाल अधिकारों के बीच संतुलन

लेखक: विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

तिथि: 3 अक्टूबर 2026

स्थान: गया, बिहार

महात्मा गांधी ने स्वच्छता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी को अपने विचारों में महत्वपूर्ण स्थान दिया था। विद्यालयों में स्वच्छता को लेकर होने वाली चर्चाएं भी इसी सवाल से जुड़ी हैं कि बच्चों को अपने परिवेश के प्रति जिम्मेदार बनाना शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए या नहीं।

कई बार विद्यालयों में बच्चों द्वारा अपनी कक्षा व्यवस्थित करने, कचरा उठाने या पौधों में पानी देने जैसी गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते हैं। ऐसे मामलों में यह समझना जरूरी है कि सामूहिक शैक्षणिक गतिविधि और बच्चों से अनुचित श्रम कराने के बीच स्पष्ट अंतर है।

गया के मध्य विद्यालय डिहुरी के प्रधानाध्यापक वीरेंद्र कुमार से संबंधित इस आलेख में विद्यालयों में स्वच्छता, शिक्षकों की भूमिका और बच्चों में श्रम के प्रति सम्मान विकसित करने के मुद्दे उठाए गए हैं।

जापान की स्कूल व्यवस्था से क्या सीख मिलती है?

जापान के कई विद्यालयों में 'ओ-सोजी' नामक सामूहिक सफाई परंपरा प्रचलित है। इसमें विद्यार्थी और शिक्षक विद्यालय परिसर को व्यवस्थित रखने में भाग लेते हैं। इस गतिविधि को जिम्मेदारी, अनुशासन और सामुदायिक भावना से जोड़कर देखा जाता है।

भारत में भी विद्यालयों में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों को बच्चों की शिक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि, ऐसी गतिविधियों में बच्चों की आयु, सुरक्षा, गरिमा और स्वैच्छिक भागीदारी का ध्यान रखना आवश्यक है।

श्रम की गरिमा और समानता का महत्व

विद्यालय केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करने का स्थान नहीं है। यह बच्चों में सामाजिक जिम्मेदारी, समानता और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति सम्मान विकसित करने का भी माध्यम है।

जब विद्यार्थी शिक्षक के मार्गदर्शन में अपनी कक्षा व्यवस्थित करते हैं, पौधों की देखभाल करते हैं या स्वच्छता अभियान में भाग लेते हैं, तो उन्हें सामूहिक जिम्मेदारी का अनुभव मिलता है। ऐसी गतिविधियों में किसी बच्चे के साथ जाति, वर्ग, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

बच्चों को यह समझाना महत्वपूर्ण है कि कचरा फैलाने के बजाय उसका उचित निपटान करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

शिक्षकों की जिम्मेदारी और प्रशासन की भूमिका

विद्यालयों में किसी घटना का वीडियो सामने आने पर कार्रवाई से पहले उसका पूरा संदर्भ समझना आवश्यक है। केवल छोटे वीडियो या अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए। संबंधित शिक्षक, विद्यार्थी और विद्यालय प्रशासन का पक्ष भी सुना जाना चाहिए।

यदि बच्चों से दंड के रूप में सफाई कराई जाती है, किसी विशेष वर्ग के बच्चों को अलग से ऐसे काम सौंपे जाते हैं या उनसे जोखिमपूर्ण और अनुचित शारीरिक श्रम कराया जाता है, तो यह गंभीर बाल अधिकार संबंधी विषय बन सकता है।

इसके विपरीत, शिक्षक की निगरानी में पूरी कक्षा की समान भागीदारी वाली सुरक्षित स्वच्छता और बागवानी गतिविधियों का उद्देश्य शैक्षणिक होना चाहिए, न कि किसी कर्मचारी के नियमित कार्य का विकल्प तैयार करना।

कानून क्या कहता है?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17: इस प्रावधान के तहत बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न से सुरक्षा दी गई है। उल्लंघन की स्थिति में संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध लागू सेवा नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।

NCPCR दिशानिर्देश: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने विद्यालयों में शारीरिक दंड, मानसिक उत्पीड़न और भेदभाव रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं। विद्यालयों में शिकायत निवारण व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 75: बच्चों के प्रति क्रूरता से संबंधित इस प्रावधान के तहत परिस्थितियों के अनुसार कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। किसी विशेष सफाई गतिविधि पर इसका लागू होना मामले के तथ्यों और कानूनी परीक्षण पर निर्भर करेगा।

बाल एवं किशोर श्रम कानून: बच्चों से नियमित, अनुचित या प्रतिबंधित श्रम कराने के मामलों में संबंधित कानूनों का परीक्षण आवश्यक है। शैक्षणिक गतिविधि और रोजगार या श्रम-शोषण को एक समान नहीं माना जाना चाहिए।

शिक्षा नीति में स्वच्छता और सामुदायिक भागीदारी

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में नैतिक एवं संवैधानिक मूल्यों, अनुभवात्मक शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया गया है। स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति सम्मान को विद्यालयी गतिविधियों से जोड़ा जा सकता है।

निष्कर्ष: विवाद गतिविधि का नहीं, उसके तरीके का है

विद्यालयों में स्वच्छता और बागवानी जैसी गतिविधियां बच्चों में जिम्मेदारी और श्रम के प्रति सम्मान विकसित करने का अवसर प्रदान कर सकती हैं। लेकिन इनका संचालन सुरक्षित, समानतापूर्ण और बाल अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।

शिक्षा विभाग, शिक्षक और अभिभावक मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित कर सकते हैं, जिसमें बच्चों को स्वावलंबन का अवसर मिले और किसी भी परिस्थिति में उनके अधिकारों, गरिमा या सुरक्षा से समझौता न हो।

श्रम की गरिमा सिखाना शिक्षा का हिस्सा है, लेकिन बच्चों से दंडात्मक, भेदभावपूर्ण या शोषणकारी काम कराना स्वीकार्य नहीं है।

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