" बिहार कोकिला पद्म विभूषण शारदा सिन्हा की 74वीं जयंती पर शत-शत नमन"
शारदा सिन्हा जयंती 2026: बिहार की लोकसंस्कृति और संगीत की अमर आवाज
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
1 अक्टूबर 2026
गयाजी: बिहार की धरती ने समय-समय पर ऐसी विभूतियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी साधना से लोक-संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इनमें पद्म विभूषण से सम्मानित दिवंगत लोकगायिका शारदा सिन्हा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह बिहार की सांस्कृतिक पहचान, लोक-आस्था और पारंपरिक गीतों की प्रमुख आवाज थीं।
भारत सरकार ने जनवरी 2025 में उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की थी। 27 मई 2025 को राष्ट्रपति भवन में उनके पुत्र अंशुमान सिन्हा ने यह सम्मान ग्रहण किया। इससे पहले उन्हें पद्मश्री (1991), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2000) और पद्मभूषण (2018) से सम्मानित किया गया था।
हुलास से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर
शारदा सिन्हा का जन्म 1 नवंबर 1952 को बिहार के सुपौल जिले के हुलास गांव में हुआ था। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा और साधना के साथ लोकसंगीत को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। मैथिली, भोजपुरी और मगही सहित विभिन्न भाषाओं में उनके गीतों ने लोकपरंपराओं को व्यापक श्रोतावर्ग तक पहुंचाया।
उनकी गायकी में पारंपरिक लोकधुनों, पारिवारिक भावनाओं और ग्रामीण जीवन की संवेदनाओं का विशेष स्थान रहा। विवाह गीतों, विदाई की भावनाओं और लोकजीवन से जुड़े गीतों के माध्यम से उन्होंने श्रोताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।
लोकगीतों में शालीनता और संवेदना
शारदा सिन्हा के गीतों में पारंपरिक लोकसंगीत की सहजता और भावनात्मक गहराई दिखाई देती है। उनके लोकप्रिय गीतों में “बाबुल जो तुमने सिखाया”, “कहे तोसे सजना” और “तार बिजली से पतले हमारे पिया” जैसे गीत शामिल हैं। उनके गायन ने लोकसंगीत को फिल्मों और व्यापक संगीत जगत तक पहुंचाने में योगदान दिया।
छठ पर्व और शारदा सिन्हा की आवाज
बिहार और पूर्वांचल में छठ पर्व के अवसर पर शारदा सिन्हा के गीत विशेष रूप से सुने जाते हैं। “केलवा के पात पर” और “कांच ही बांस के बहंगिया” जैसे छठ गीत उनकी लोकप्रिय संगीत विरासत का हिस्सा हैं। पर्व के दौरान घाटों और घरों में उनके गीतों की गूंज अनेक श्रद्धालुओं के लिए भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव का माध्यम बनती है।
उनकी आवाज ने छठ पर्व से जुड़े लोकगीतों को देश के विभिन्न हिस्सों और प्रवासी भारतीय समुदायों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संगीत की विरासत सदैव जीवित रहेगी
शारदा सिन्हा का निधन 5 नवंबर 2024 को हुआ। उनके जाने से भारतीय लोकसंगीत जगत ने एक विशिष्ट स्वर खो दिया, लेकिन उनके गीत आज भी श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हैं।
लोक-संस्कृति, मातृत्व, परंपरा और सूर्योपासना से जुड़े उनके गीत आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते रहेंगे।
उनकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन। उनकी संगीत साधना और सांस्कृतिक योगदान भारतीय लोकसंगीत की विरासत में सदैव याद किए जाएंगे।
विजय कुमार
वरिष्ठ पत्रकार