अपराधी का मन: परिस्थिति का शिकार या जन्मजात विकार?
भूमिका
कानून और अपराध—एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सामान्यतः हम अपराध होने के बाद कानून की धाराओं, दंड संहिता या न्यायिक प्रक्रिया में व्यस्त हो जाते हैं। लेकिन एक अपराधशास्त्री (Criminologist) के रूप में, हमें इसकी गहराई में जाने की आवश्यकता है। अपराध क्यों होता है? एक व्यक्ति स्वस्थ समाज को छोड़कर अपराध की अंधेरी दुनिया को क्यों चुनता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर हमारे सामने ‘क्रिमिनल साइकोलॉजी’ यानी अपराधी का मनोविज्ञान आता है।
क्या अपराध जन्मजात है?
इतालवी अपराधशास्त्री सीज़र लोम्ब्रोसो का कभी यह मानना था कि मनुष्य अपराधी पैदा होता है। लेकिन आधुनिक अपराधशास्त्र और मनोविज्ञान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान में यह माना जाता है कि अपराध कोई जन्मजात विशेषता नहीं है, बल्कि यह आनुवंशिकता (Heredity) और पर्यावरण (Environment) का एक जटिल मिश्रण है। एक व्यक्ति का पालन-पोषण, उसके बचपन का आघात (Trauma), अकेलापन या उपेक्षा उसे धीरे-धीरे अपराध की राह पर धकेल सकती है।
मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि (Psychological Insights)
मुख्य कारण:
अपराधी मन के पीछे कई मनोवैज्ञानिक पहलू कार्य करते हैं:
१. बचपन के अनुभव: मनोवैज्ञानिक फ्रायड का मानना था कि बचपन की कोई अतृप्त इच्छा या कड़वी यादें मनुष्य के अवचेतन मन में जमा रहती हैं, जो बाद में आपराधिक व्यवहार का रूप ले लेती हैं।
२. भावनात्मक बुद्धिमत्ता का अभाव (Lack of EQ): कई बार अपराधी यह समझ नहीं पाता कि उसके कृत्य से दूसरों को कितनी हानि हो रही है। दूसरों के दर्द को महसूस करने की यह अक्षमता (Lack of Empathy) उसे हिंसक बना देती है।
३. सामाजिक शिक्षा: समाजशास्त्री अल्बर्ट बांडुरा के अनुसार, मनुष्य अक्सर अपने आसपास के वातावरण, सिनेमा या इंटरनेट को देखकर अपराध करना सीखता है। इसे ‘सोशल लर्निंग थ्योरी’ कहा जाता है।
अपराधी या बीमार?
हमारे समाज में अक्सर साइकोपैथ (Psychopath) या सोशियोपैथ (Sociopath) को केवल अपराधी के रूप में देखा जाता है। लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, वे एक प्रकार के मानसिक विकार से ग्रस्त होते हैं। वे ठंडे दिमाग से योजना बनाकर अपराध करते हैं और उनमें कोई पछतावा नहीं होता। कानून का शासन बनाए रखने के साथ-साथ इनका मानसिक उपचार भी अनिवार्य है।
रोकथाम और उपचार
केवल कड़े कानून या जेल में बंद करने से अपराध को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता। अपराध कम करने के लिए हमें समाज की गहराई तक पहुँचना होगा।
सुधार गृह: जेल को केवल सजा का केंद्र न बनाकर ‘सुधार गृह’ के रूप में विकसित करना चाहिए, जहाँ अपराधी की मानसिक काउंसलिंग की जा सके।
सामाजिक जागरूकता: बचपन से ही बच्चों में नैतिकता और सहानुभूति की शिक्षा दी जानी चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य: अवसाद (Depression) या चिंता (Anxiety) किसी को अपराध के रास्ते पर न धकेले, इस पर ध्यान देना आवश्यक है।
निष्कर्ष
कानून केवल अपराधी को सजा देता है, लेकिन मनोविज्ञान अपराध के कारणों की पहचान करता है। समाज से अपराध मिटाना है तो हमें अपराधी से नहीं, बल्कि अपराध की मानसिकता से घृणा करना सीखना होगा। यदि न्याय व्यवस्था और मनोविज्ञान मिलकर काम करें, तभी हम एक सुरक्षित और सुंदर समाज का निर्माण कर पाएंगे। हमारा उत्तरदायित्व मनुष्य के मन के उन अंधेरे पहलुओं को समझना और न्याय के प्रकाश से उन्हें दूर करना है।
रुद्र मंडल