April 1, 2026

मजबूरी, बीमारी और बीच में खड़े दलाल; यूपी में कैसे चल रहा किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट

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कानपुर में 30 मार्च की देर रात उजागर हुआ किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट एक ऐसी परत-दर-परत खुलती कहानी है, जिसमें एक तरफ गरीबी और मजबूरी है, दूसरी तरफ बीमारी और लाचारी, और इनके बीच खड़ा है एक संगठित नेटवर्क.

इस पूरे मामले की शुरुआत भले ही एक डोनर के पैसे को लेकर हुए विवाद से हुई हो, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह साफ होता गया कि यह कोई छोटा-मोटा खेल नहीं, बल्कि कई शहरों और राज्यों में फैला हुआ एक संगठित अपराध है.

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में है आयुष नाम का युवक, जो बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला है और मेरठ में रह रहा था. आर्थिक तंगी और जल्दी पैसे कमाने की चाह ने उसे उस रास्ते पर ला खड़ा किया, जहां से लौटना आसान नहीं होता. टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म और बिचौलियों के जरिए उससे संपर्क किया गया. उसे भरोसा दिलाया गया कि किडनी देने के बदले उसे 10 लाख रुपए मिलेंगे.

कानपुर बुलाकर आयुष से डील फाइनल कराई गई. इसके बाद उसे केशवपुरम स्थित आहूजा अस्पताल ले जाया गया, जहां सर्जरी कर उसकी किडनी निकाल ली गई. लेकिन ऑपरेशन के बाद जब भुगतान का समय आया, तो उसे तय रकम से कम पैसे दिए गए. यहीं से कहानी पलटती है. पैसे को लेकर हुए विवाद के बाद आयुष ने पुलिस को फोन कर दिया. यह कॉल उस पूरे नेटवर्क के लिए सबसे बड़ी चूक साबित हुई.

पहले से सतर्क थी पुलिस

पुलिस के लिए यह सूचना नई जरूर थी, लेकिन पूरी तरह अनजान नहीं. जानकार बताते हैं कि पिछले कुछ हफ्तों से संदिग्ध गतिविधियों को लेकर इनपुट मिल रहे थे. करीब 22 दिनों तक पुलिस और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने लगातार निगरानी की. जब पुख्ता जानकारी मिल गई, तो 30 मार्च को डीसीपी वेस्ट की क्राइम ब्रांच, एसओजी और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने एक साथ तीन अस्पतालों पर छापेमारी की. सबसे पहले कानपुर के आहूजा अस्पताल पर छापा पड़ा, जहां ट्रांसप्लांट हुआ था.

इसके बाद कल्याणपुर के प्रिया अस्पताल में पुलिस पहुंची, जहां रिसीवर पारुल तोमर भर्ती मिलीं और फिर पनकी रोड के मेडलाइफ अस्पताल पर छापामारी हुई जहां डोनर आयुष को रखा गया था. तीनों जगहों पर एक जैसी तस्वीर सामने आई, कोई वैध दस्तावेज नहीं, ट्रांसप्लांट प्रक्रिया का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं, और अस्पताल प्रशासन के पास कोई ठोस जवाब नहीं.

संगठित अपराध की पूरी चेन

जांच में यह बात सामने आई कि ट्रांसप्लांट के तुरंत बाद डोनर और रिसीवर को अलग-अलग अस्पतालों में भेज दिया जाता था. इसका मकसद था कि अगर किसी एक जगह पर संदेह हो, तो पूरी कड़ी न खुल पाए. प्रिया अस्पताल में पारुल को गॉल ब्लैडर ऑपरेशन के नाम पर भर्ती कराया गया. फोन पर खुद को डॉक्टर बताने वाले व्यक्ति ने निर्देश दिया और बिना किसी सत्यापन के मरीज को भर्ती कर लिया गया. इसी तरह डोनर आयुष को मेडलाइफ अस्पताल में रखा गया, जहां उसकी हालत बेहद खराब थी. एक छोटे से कमरे में बिना डॉक्टर की निगरानी के सिर्फ ड्रिप के सहारे उसे छोड़ दिया गया.

यह पूरा पैटर्न दिखाता है कि ऑपरेशन के बाद मरीजों को ‘बिखेरना’ इस नेटवर्क की तय रणनीति थी. इस रैकेट का तरीका बेहद सुनियोजित था. सबसे पहले आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को निशाना बनाया जाता. उन्हें जल्दी पैसे का लालच दिया जाता. दूसरी तरफ, किडनी फेल्योर के मरीजों को संपर्क किया जाता, जिन्हें लंबे इंतजार से बचाने और जल्दी ट्रांसप्लांट का भरोसा दिया जाता. इसके बाद फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते, जिनमें डोनर और रिसीवर के बीच रिश्तेदारी दिखाई जाती.

कानून के मुताबिक, बिना रिश्तेदारी के अंगदान की अनुमति मुश्किल होती है, इसलिए यह फर्जीवाड़ा जरूरी कड़ी था. सर्जरी के लिए ऐसे अस्पताल चुने जाते, जहां निगरानी कम हो या जहां नेटवर्क की पकड़ मजबूत हो. डॉक्टरों की टीम बाहर से बुलाकर ऑपरेशन कराती, ताकि स्थानीय पहचान से बचा जा सके.
इस पूरे खेल का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसका आर्थिक मॉडल है. डोनर को 8 से 10 लाख रुपए देने का वादा किया जाता, लेकिन कई बार उसे 4 से 5 लाख रुपए में ही टाल दिया जाता. वहीं रिसीवर से 60 से 80 लाख रुपए तक वसूले जाते थे. यानी एक किडनी ट्रांसप्लांट पर 10 से 15 गुना तक का मुनाफा. यह अंतर ही इस पूरे अवैध कारोबार को जिंदा रखता है. गरीब अपनी मजबूरी में शरीर का हिस्सा बेचने को तैयार हो जाता है और अमीर अपनी जान बचाने के लिए किसी भी कीमत पर भुगतान करने को.

दलालों की भूमिका : भरोसे का जाल

इस रैकेट में सबसे अहम भूमिका बिचौलियों की थी. कानपुर में पकड़े गए किडनी रैकेट में शिवम अग्रवाल उर्फ शुभम जैसे लोग इस नेटवर्क की रीढ़ थे. वह खुद को डॉक्टर या मेडिकल स्टाफ बताकर लोगों से संपर्क करता. मरीजों को भरोसा दिलाता कि उनका ट्रांसप्लांट सुरक्षित तरीके से होगा. डोनर्स को पैसे का लालच देकर जोड़ता और फिर दोनों पक्षों के बीच सौदा तय कराता. उसकी पहुंच बड़े अस्पतालों तक थी, जहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों को वह अपने जाल में फंसाता था. पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि दिल्ली और लखनऊ से डॉक्टरों की टीम बुलाकर ऑपरेशन कराए जाते थे. यह तथ्य इस मामले को और गंभीर बना देता है क्योंकि इसका मतलब है कि इसमें सिर्फ स्थानीय स्तर के लोग नहीं, बल्कि प्रशिक्षित मेडिकल प्रोफेशनल भी शामिल थे. अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन डॉक्टरों की भूमिका कितनी गहरी थी और क्या वे जानबूझकर इस अवैध नेटवर्क का हिस्सा बने थे.

डोनर आयुष की हालत इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू है. ऑपरेशन के बाद उसकी स्थिति बिगड़ती गई, लेकिन उसे उचित इलाज नहीं मिला. वह दर्द से तड़पता रहा, पुलिस से मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन शुरुआती घंटों में उसे बेहतर अस्पताल में शिफ्ट नहीं किया गया. यह सवाल उठाता है कि क्या डोनर सिर्फ एक ‘साधन’ बनकर रह गया है, जिसकी उपयोगिता खत्म होते ही उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है?

कई राज्यों तक फैला नेटवर्क

जांच में यह साफ हुआ है कि यह रैकेट सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं था. इसके तार लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और नेपाल तक जुड़े हुए हैं. डोनर बिहार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लाए जाते थे, जबकि रिसीवर देश के अलग-अलग हिस्सों से आते थे. अब तक 12 से ज्यादा ट्रांसप्लांट के सबूत मिले हैं, लेकिन जांच एजेंसियों को शक है कि असली संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.

हालांकि कानपुर में इससे पहले भी इसी तरह के रैकेट पकड़े जा चुके हैं. वर्ष 2019 में भी एक बड़ा नेटवर्क सामने आया था, जिसमें दिल्ली के अस्पतालों तक की भूमिका सामने आई थी. हर बार पैटर्न लगभग एक जैसा होता है, गरीब डोनर, अमीर मरीज, फर्जी दस्तावेज, और बीच में मोटा मुनाफा. इसके बावजूद ऐसे रैकेट बार-बार सामने आते हैं, जो यह दिखाता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं स्थाई खामी है.

इस मामले में पुलिस ने डॉक्टर दंपति समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया है. तीनों अस्पतालों को नोटिस जारी किया गया है और लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की गई है. एसटीएफ की टीमें अलग-अलग शहरों में छापेमारी कर रही हैं. कई संदिग्धों से पूछताछ जारी है. आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े नाम सामने आ सकते हैं.

SANGAM SHUKLA

District Reporter

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