“नमस्कार, आप देख रहे हैं इंडियन प्रेस यूनियन। मैं भरत कुमार
कहते हैं कि ऊँची इमारतों से आसमान साफ़ दिखता है, लेकिन क्या आपने कभी उन ऊँचाइयों पर बसी खामोशी को महसूस किया है? साल 2026 के इन ‘स्मार्ट होम्स’ में सब कुछ ऑटोमैटिक है—दरवाज़े, लाइट्स और यहाँ तक कि पर्दे भी। पर क्या इन आलीशान दीवारों के पीछे कोई ऐसा है जो बस एक अदद ‘आवाज़’ के लिए तरस रहा है? आज इंडियन प्रेस यूनियन की यह विशेष रिपोर्ट उन बुजुर्गों के नाम, जो कामयाबी की इस अंधी दौड़ में पीछे छूट गए हैं।
“शहर की 25वीं मंज़िल की बालकनी में बैठे एक 75 वर्षीय रिटायर्ड अधिकारी हर शाम सड़क की ओर देखते हैं। शायद इस उम्मीद में कि कोई परिचित चेहरा हाथ हिला दे। उनके बच्चे सात समंदर पार डॉलर और कामयाबी बटोर रहे हैं, लेकिन यहाँ इस सवा करोड़ के फ्लैट में बात करने वाला कोई नहीं है।
एक न्यूज़ रिपोर्टर के तौर पर जब मैं वृद्धाश्रमों का दौरा करता हूँ, तो वहाँ की भीड़ हमारे समाज की एक डरावनी तस्वीर पेश करती है। संयुक्त परिवारों का टूटना और ‘प्राइवेसी’ के नाम पर माता-पिता से दूरी बनाना आज के दौर का कड़वा सच बन चुका है। क्या करियर की ऊँचाइयों को छूने के चक्कर में हमने उन हाथों को छोड़ दिया है, जिन्होंने हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाया था?”
“मैं इस वक्त शहर की एक नामी सोसाइटी में हूँ। यहाँ सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन यहाँ के बुजुर्गों की आँखों में एक अजीब सी वीरानी है। डॉक्टरों का कहना है कि 2026 में बुजुर्गों के बीच डिप्रेशन और एंग्जायटी का सबसे बड़ा कारण ‘अकेलापन’ है। आज की युवा पीढ़ी के लिए ‘करियर’ इतना बड़ा हो गया है कि अपनों के लिए समय ‘छोटा’ पड़ गया है। सवाल यह है कि क्या हमने ‘आधुनिक’ होने का मतलब ‘रिश्तों से मुक्त’ होना समझ लिया है?”
“सिर्फ जज्बात ही नहीं, अब कानूनी और सामाजिक सुरक्षा पर भी बात होनी चाहिए। क्या सरकारें सिर्फ पेंशन को ही बुजुर्गों की पूरी ज़रूरत मानती हैं? क्या हमारे मोहल्लों में ऐसे सामुदायिक केंद्र नहीं होने चाहिए जहाँ दो पीढ़ियाँ एक साथ बैठ सकें? आज ज़रूरत है ‘माता-पिता भरण-पोषण कानून’ जैसी जानकारियों की, ताकि बुढ़ापे की लाठी को कोई बीच राह में न तोड़ सके। हर सोसाइटी में एक सक्रिय ‘सीनियर सिटीजन क्लब’ आज की अनिवार्य ज़रूरत बन चुका है।”
“याद रखिये, मकान ईंट-पत्थरों से बनते हैं, लेकिन घर रिश्तों की गर्माहट से। आलीशान फ्लैट्स और स्मार्ट गैजेट्स कभी उस माँ की लोरी या पिता की डाँट की जगह नहीं ले सकते। अगली बार जब आप अपनी ‘कामयाबी’ का जश्न मनाएं, तो एक बार पीछे मुड़कर ज़रूर देखिएगा कि कहीं कोई अपना अकेला तो नहीं रह गया।