अमेरिका की ‘सुरक्षा गारंटी’ फेल! ईरान के निशाने पर खाड़ी देश, क्या अब खुद के हथियारों के भरोसे ही बचेगा हर मुल्क?
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने अमेरिकी रक्षा तकनीक की सीमाओं को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञ इसे ‘सिक्योरोनामिक्स’ का दौर कह रहे हैं, जहां देश विकास के बजाय अपनी सुरक्षा पर भारी खर्च कर रहे हैं। पढ़ें- दुनिया में छिड़ी हथियारों की होड़, भारत के लिए अवसर या चुनौती… डिजिटल, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की जंग और खतरनाक होती जा रही है। अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देश ईरान के निशाने पर हैं और वह उनके ऊर्जा ढांचे को सफलतापूर्वक निशाना बना रहा है। इस युद्ध ने कई तरह की धारणाओं को तोड़ा है। साफ हो गया है कि अमेरिका अब किसी क्षेत्र या देश को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता है। खाड़ी के देश इसका उदाहरण हैं। तमाम अमेरिकी हथियार और रक्षा प्रणालियों की तैनाती और अमेरिका की सक्रिय मदद भी उनको ईरान की मिसाइलों से नहीं बचा पा रही है। इस युद्ध ने अमेरिकी रक्षा तकनीक की सीमाओं को भी उजागर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व में बढ़ती अस्थिरता और असुरक्षा के बीच देशों के बीच हथियारों की होड़ तेज होगी। बहुत से देशों को यह अहसास होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर किसी दूसरे देश पर निर्भर रहना खतरनाक है और उन पर दबाव बढ़ेगा कि वह रक्षा खर्च बढ़ा कर अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत बनाएं। इसका मतलब है कि जो पैसा विकास पर खर्च होता, वह अब हथियार और सैन्य तैयारियों पर खर्च होगा। इस संभावित परिदृश्य की पड़ताल आज का अहम मुद्दा है…