April 2, 2026

अमेरिका ने दूसरे देशों में क्यों बनाए मिलिट्री एयरबेस, यहां से दूसरे देशों पर कर सकता है हमला? क्या है अंतरराष्ट्रीय कानून

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध में खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने निशाने पर आए। लेकिन क्या इन एयरबेस का इस्तेमाल अमेरिका किसी अन्य देश पर हमले के लिए कर सकता है या नहीं, आइए जानते हैं।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को एक महीने से ज्यादा का समय बीत गया है। मिडिल ईस्ट में छिड़ी ये जंग केवल इन तीन देशों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि जिन भी खाड़ी देशों में अमेरिका के मिलिट्री एयरबेस मौजूद थे, वो देश भी इस संघर्ष का हिस्सा बन गए।

अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ऑपरेशन एपिक फ्यूरी चलाते हुए 28 फरवरी 2026 को ईरान पर मिसाइल अटैक किया। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई।

ईरान ने इस हमले का जवाब देने के लिए इजरायल में मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। साथ ही खाड़ी देशों कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और कतर में अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाया। ये एयरबेस अमेरिका की ताकत माने जाते हैं और ईरान ने इन्हीं सैन्य ठिकानों पर हमला करके अमेरिका को नुकसाना पहुंचाया है।
दुनियाभर में अमेरिका सबसे बड़ा ओवरसीज सैन्य नेटवर्क चलाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया में करीब 70 से ज्यादा देशों में अमेरिकी मिलिट्री बेस मौजूद हैं।
अमेरिका के मिलिट्री बेस और इनके इस्तेमाल को लेकर क्या हैं अंतरराष्ट्रीय कानून, इन सभी बातों को समझने से पहले ये जानते हैं कि आखिरी ये ओवरसीज बेस होते क्या हैं और भारत में अमेरिका का कोई मिलिट्री बेस क्यों नहीं है।
क्या है ओवरसीज बेस?
विदेशी अड्डे, जिन्हें ‘ओवरसीज बेस’ भी कहा जाता है, एक तरह के सैन्य ठिकाने होते हैं। इन बेस का इस्तेमाल करके कोई भी देश उस क्षेत्र की सैन्य शक्ति के माध्यम से सीधा प्रभाव डालना चाहता है।

मिलिट्री बेस का इस्तेमाल उन देशों को सुरक्षा देने के लिए भी किया जाता है, जिस देश में ये बने होते हैं। कोई देश किसी दूसरे देश में मिलिट्री बेस इसलिए भी बनाता है, जिससे वे उन देशों को सुरक्षा दे सके। इसके बदले में मिलिट्री एयरबेस प्राप्त करने वाले देश उन्हें राजनीतिक समर्थन देते हैं।

इन ठिकानों पर सैन्य प्रतिष्ठान और सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, जो सैन्य गतिविधियों, प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स और सहायता कार्यों में हिस्सा लेते हैं। घरेलू मिलिट्री बेस की तरह ही, इन विदेशी बेस से भी थल, वायु, अंतरिक्ष, साइबरस्पेस, नौसेना और पनडुब्बी संबंधी अभियानों को चलाया जा सकता है।
दुनियाभर में अमेरिका के सैन्य ठिकाने
अमेरिका ने दुनियाभर के कई देशों में मिलिट्री एयरबेस बनाए हुए हैं, लेकिन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने युद्ध से पहले ये नहीं सोचा होगा कि ईरान, अमेरिका को नुकसान पहुंचाने के लिए दूसरे देशों में अमेरिकी मिलिट्री बेस को निशाना बनाएगा।

अमेरिका के सैन्य ठिकाने मिडिल ईस्ट के साथ ही यूरोप और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी हैं। ईरान ने इस युद्ध में अमेरिका के जिन ठिकानों पर हमला किया, वे खाड़ी देशों में उसके सबसे रणनीतिक अमेरिकी बेस हैं।

UAE- अल धाफरा एयरबेस: अमेरिका का ये एयरबेस संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में है। यहां करीब पांच हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। इस युद्ध में ईरान ने अमेरिका के इस एयरबेस पर हमला किया है।

कुवैत- अली अल-सालेम एयरबेस: अमेरिका का ये मिलिट्री एयरबेस द रॉक के नाम से जाना जाता है। मिडिल ईस्ट में छिड़े युद्ध में इस एयरबेस पर कई बार सायरन की आवाज सुनी गई हैं।

कतर- अल उदीद एयरबेस: कतर में स्थित इस अमेरिकी मिलिट्री एयरबेस पर हजारों अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ईरान ने युद्ध में इस मिलिट्री बेस पर भी हमला किया है।
भारत में क्यों नहीं है अमेरिका का मिलिट्री बेस?
अमेरिका के जहां 70 से ज्यादा देशों में मिलिट्री बेस हैं, वहीं भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर चलते हुए अमेरिका को एयरबेस बनाने की इजाजत नहीं दी है। भारत ने आजादी के बाद से ही किसी भी देश के सैन्य गुट से जुड़ने का समर्थन नहीं किया है।

किसी दूसरे देश को अपने यहां मिलिट्री बेस बनाने की इजाजत देने से अनचाहे युद्ध में प्रवेश का रास्ता खुल जाता है। मिडिल ईस्ट में छिड़े युद्ध में खाड़ी देशों पर हुए हमले इसी बात का उदाहरण हैं और भारत ऐसी परिस्थिति खुद को दूर रखने की कोशिश करता है।

भारत ने भले ही किसी देश को अपने यहां एयरबेस बनाने की इजाजत नहीं दी है, लेकिन हमारे देश के वैश्विक ताकतों के साथ बेहतर रणनीतिक संबंध हैं। इन देशों में अमेरिका और रूस जैसे कई बड़े देशों के नाम शामिल हैं। किसी दूसरे देश को सैन्य ठिकाना बनाने की इजाजत देने से यह संबंध बिगड़ सकते हैं।

भारत ने अमेरिका को मिलिट्री बेस बनाने की इजाजत नहीं दी है, लेकिन दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग काफी मजबूत है। भारत और अमेरिका लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट से जुड़े हैं।

इस एग्रीमेट के तहत एयरक्राफ्ट और बाकी सुरक्षा उपकरणों में ईंधन भरने और मरम्मत करने के लिए एक दूसरे की सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल करने की अनुमति है, लेकिन इसके तहत देश में सेना की तैनाती करना शामिल नहीं है।
क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?
अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, किसी भी देश के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उसकी भूमि या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल किसी दूसरे देश पर हमले के लिए न किया जाए।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सिद्धांत UN चार्टर के आर्टिकल 2(4) और ‘Due Diligence’ के नियमों से जुड़ा है। अगर कोई देश जानबूझकर दूसरे देश पर हमले के लिए अपनी जमीन इस्तेमाल करने की इजाजत देता है, तो वह कानूनी रूप से सवालों के घेरे में आ जाता है।

अंतरराष्ट्रीय कानून के ये सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नैतिक और कूटनीतिक आधार हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध में इस्तेमाल किए गए सैन्य ठिकाने किसी तीसरे देश के थे, तो जिम्मेदारी सिर्फ हमला करने वाले देश की नहीं होती।

विदेशी धरती पर बने एयरबेस से हमला करने के मामले पूरी तरह से ब्लैक-एंड-व्हाइट नहीं होते। अगर उस देश की सरकार अपनी मर्जी से एयरबेस का इस्तेमाल करने की इजाजत देती है तो इसे पूरी तरह से कानूनों का उल्लंघन माना जाता है।

इन सभी बातों से ये साबित होता है कि किसी देश की जमीन का इस्तेमाल किसी अन्य देश पर हमला करने के लिए करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है।

SANGAM SHUKLA

District Reporter

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