March 12, 2026

आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश का ये गाँव क्यों चर्चा में

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले का एक गाँव आजकल चर्चा में है. राजधानी लखनऊ से फ़ैज़ाबाद हाइवे पर सफ़दरगंज से मुड़ने के बाद कुछ किलोमीटर की दूरी पर ‘किंतूर’ गाँव है.

रमज़ान का महीना होने की वजह से यहाँ इक्का-दुक्का लोग ही बाहर दिखाई देते हैं.

ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की इसराइल और अमेरिका के हमले में मौत के बाद इस गाँव की चर्चा होने लगी है.

ये दावा किया जाता है कि ईरान के पहले सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रुहोल्लाह मुसावी ख़ुमैनी के पूर्वज इस गाँव में रहा करते थे.इस गाँव में पहले शिया सादात (सैयद) की बड़ी आबादी थी.

यहाँ के रहने वाले और ख़ुमैनी के वंशज होने का दावा करने वाले निहाल काज़मी कहते हैं, “इस गाँव में तकरीबन 500 घर शिया समुदाय के थे. लेकिन लोगों ने पलायन किया और अब सिर्फ़ चार घर बचे हैं.”निहाल काज़मी दावा करते हैं, “आयतुल्लाह ख़ुमैनी के परदादा सैयद अहमद मुसावी ‘हिंदी’ का जन्म 19वीं सदी की शुरुआत में बाराबंकी के इसी गाँव में हुआ था. 1834 के आसपास वह अवध के तत्कालीन नवाब के साथ ज़ियारत (दर्शन) के लिए ईरान गए थे. लेकिन वापस नहीं लौटे और वहीं बस गए.”

उन्होंने बताया, “उनसे हमारी रिश्तेदारी यह है कि उनके दादा अहमद हुसैन हिंदी साहब हमारे परदादा के दादा के चचेरे भाई होते थे.”

अमेरिका और इसराइल के हमले में ख़ामेनेई की मौत के बाद इस गाँव में मीडिया वालों का आना-जाना लगा हुआ है.

इस गाँव में भी ख़ामेनेई की मौत के बाद लोगों में शोक है. तीन दिन लगातार शोक सभा हुई है. इसमें शिया और सुन्नी, दोनों समुदाय के लोग शामिल थे.

इस गाँव में पुरानी इमारतें और कई सूफ़ी संतों की मज़ारें भी हैं.

लखनऊ स्थित प्रमुख शिया धर्मगुरु सैयद अली नासिर सईद अबाक़ाती आग़ा रूही के भी पूर्वज किंतूर के रहने वाले थे.

उन्होंने बताया, “ईरान के पहले सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ुमैनी से उनकी पुरानी रिश्तेदारी है. ख़ुमैनी साहब के पूर्वज किंतूर से ईरान के ख़ुमैन गए थे.”

आग़ा रूही के पुत्र मौलाना अब्बास नासिर अबाक़ाती कहते हैं, “ख़ुमैनी साहब के दादा सैयद अहमद मूसवी हिंदी, मेरे पिता के पर दादा के चचेरे भाई थे. ईरान के ख़ुमैन में बस गए थे. वहां पर आज भी उनका घर बैते हिंदी कहलाता है.”लखनऊ स्थित इतिहासकार रवि भट्ट ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “अवध के नवाब भी शिया समुदाय से थे. इसलिए उस दौर में कई शिया आबादी लखनऊ और आसपास के इलाक़ों मे रहती थी.”

उन्होंने कहा, “ये माना जाता है कि ख़ुमैनी के भी पूर्वज ईरान के खोरासान प्रांत के निशापुर से यहाँ आए और अपने रिश्तेदारों के साथ बस गए थे. क्योंकि अवध के दूसरे नवाब सफ़दरजंग भी निशापुर से भारत आए थे. निशापुर से पलायन करके उनके साथ कई लोग आए जो विभिन्न इलाक़ों में बस गए थे.”

अवध के दूसरे नवाब सफ़दरजंग का जन्म 1708 में निशापुर में हुआ था. उनका मक़बरा दिल्ली के सफ़दरजंग में है.

रौशन तक़ी लखनऊ में इतिहासकार हैं. उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के कई क़स्बे ऐतिहासिक तौर पर पुराने हैं. कई क़स्बों का इतिहास एक हज़ार साल पुराना है.रौशन तक़ी बताते हैं, “ये चर्चा इस्लामी क्रांति के दौरान शुरू हुई थी. उस दौर के मौलानाओं का एक प्रतिनिधिमंडल ईरान गया था, जिसने ख़ुमैनी से मुलाक़ात की थी. उनमें आग़ा रूही भी थे. तब से ये कहा जाने लगा कि ख़ुमैनी का ताल्लुक़ भारत के किंतूर से है.”

उन्होंने कहा, “इस दावे को किसी ने अभी तक ख़ारिज नहीं किया है. ईरान सरकार की तरफ़ से कभी ये दावा ख़ारिज नहीं किया गया है.”

किंतूर से थोड़ी दूर पर रसूलपुर के रहने वाले रेहान काज़मी पेशे से डॉक्टर हैं. रेहान काज़मी की रिश्तेदारी भी किंतूर में है.

उनका दावा है कि बीबीसी फ़ारसी के संपादक रहे बाक़िर मोइन ने ख़ुमैनी के भारत से संबंध के बारे में विस्तार से लिखा है.

उन्होंने बताया, “तकरीबन 25 साल पहले ईरान से एक टीम आई थी, जो इस बात की जानकारी ले रही थी. लेकिन उसके बाद कुछ पता नहीं चल पाया है. ईरान के रहने वाले बाक़िर मोइन ने अपनी किताब ‘ख़ुमैनी’ में बताया है कि आयुतल्लाह ख़ुमैनी के पूर्वज पहले ईरान के निशापुर से भारत आए और उसके बाद ईरान वापस लौट गए थे.”

ईरान का निशापुर शिया समुदाय का बड़ा केंद्र था. मूसवी सादात शिया समुदाय के सातवें इमाम मूसा काज़िम के वंशज हैं.आयतुल्लाह रुहोल्लाह मुसावी ख़ुमैनी का जन्म 1902 में ईरान में हुआ था.

रुहोल्लाह के जन्म के पाँच महीने बाद उनके पिता सैयद मुस्तफ़ा हिंदी की मौत हो गई थी. पिता की मौत के बाद ख़ुमैनी का लालन-पालन उनकी माँ और मौसी ने किया और उन्होंने अपने बड़े भाई मुर्तज़ा की देख-रेख में इस्लामी शिक्षा ग्रहण की.

रुहोल्लाह ख़ुमैनी को इस्लामी विधिशास्त्र और शरिया (धार्मिक शिक्षा) में विशेष रुचि थी और इसके साथ-साथ उन्होंने पश्चिमी दर्शनशास्त्र का भी अध्ययन किया.

अरस्तू को तो वे तर्कशास्त्र का जनक मानते थे.

ईरान स्थित इस्लामी शिक्षा केंद्रों में पढ़ते-पढ़ाते वे शहंशाही राजनीतिक प्रणाली का पुरज़ोर विरोध करने लगे और उसकी जगह विलायत-ए-फ़कीह (धार्मिक गुरु की संप्रभुता) जैसी पद्धति की वकालत करने लगे थे.

वे ईरान के एक प्रमुख शिया धर्मगुरु, राजनीतिक क्रांतिकारी और नेता थे. वे 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद देश के पहले सुप्रीम लीडर बने और 1989 में मृत्यु तक इस पद पर रहे.

उन्हें इस्लामिक क्रांति के आंदोलन का मुख्य नेता माना जाता है, जिन्होंने ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की सत्ता का तख़्तापलट किया और देश को एक इस्लामी गणराज्य में बदल दिया था.आयतुल्लाह ख़ुमैनी के दौर में ईरान और इराक़ में आठ साल लंबा युद्ध चला था. इसके अलावा उन्होंने लेखक सलमान रूश्दी के ख़िलाफ़ फ़तवा भी जारी किया था.

हालाँकि जब वो ईरान में सुप्रीम लीडर थे, तो कभी उन्होंने बाराबंकी के इस गाँव में संपर्क करने का प्रयास नहीं किया था.

किंतूर में रहने वाले 76 साल के अफ़सर अब्बास ने बताया कि उनके पूर्वज इस गाँव में 700 साल से रहते आ रहे हैं.

उन्होंने कहा, “जब ईरान की इस्लामिक क्रांति हुई, तब ख़ुमैनी का नाम आया. तब उसमें यह भी हुआ कि वह यहाँ के रहने वाले थे और इंडिया में बाराबंकी ज़िले के किंतूर के रहने वाले थे, तभी यह बात सामने आई कि उनके पूर्वज हमारे गाँव के ही रहने वाले थे.”

अफ़सर अब्बास याद करते हुए कहते हैं, “उस ज़माने में भी कई प्रेस वाले आए थे. ये जानकर कि ख़ुमैनी के कई रिश्तेदार इस गाँव में रहते हैं. उन लोगों से पता चला कि उनके ही ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे, दस्तावेज़ देखा गया, तो पता चला कि उनके बुज़ुर्ग यहीं से गए थे. इस तरह यह बात साबित हुई कि ख़ुमैनी के पूर्वज किंतूर के रहने वाले थे.”

अफ़सर अब्बास बताते हैं कि उनके बुज़ुर्गों ने बताया कि गाँव के पूरब की तरफ़ उनकी रिहाइश थी.

हालाँकि गाँव में अब उस घर का नामो-निशान नहीं है. लेकिन इस गाँव में कई पुरानी इमारतें हैं.

ख़ुमैनी को अपना पूर्वज बताने वाले निहाल काज़मी कहते हैं, “ईरान का सुप्रीम लीडर बनने के बाद से कोई संपर्क नहीं किया, बल्कि जो लोग ईरान जाते थे उनसे एक-दो बार मुलाकात ज़रूर हुई है.”मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध से किंतूर के लोग भी चिंतित हैं.

ईरान के सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई की मौत के बाद से यहाँ पर शोक सभाएँ हुईं और प्रदर्शन भी हुए थे.

अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा ख़ामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना गया है.

अली ख़ामेनेई की मौत के बाद शिया समुदाय के लोग सड़कों पर निकल आए.

उत्तर प्रदेश के कई शहरों में प्रदर्शन भी हुए. भारत में शिया समुदाय ने तीन दिन के शोक का ऐलान किया था.

शिया समुदाय के लोग अभी भी मस्जिदों और इमामबाड़ों में जलसों के ज़रिए इस घटना की निंदा कर रहे हैं.

लखनऊ में शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा, “उन्होंने ख़ामेनेई साहब को हमसे छीन लिया है, लेकिन ख़ामेनेई साहब का मक़सद आज भी ज़िंदा है और आगे भी रहेगा.”

लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान जहाँ लोग इसराइल और अमेरिका के हमले की निंदा कर रहे थे, वहीं शोक भी मना रहे थे.

लखनऊ के शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ़ अब्बास और प्रमुख धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने ईद की नमाज़ के दौरान काली पट्टी बाँधने की अपील की है.

SANJAY PANDEY

SANJAY PANDEY

District Reporter

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