ईरान और अमेरिका के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी एक बार फिर खुली जंग में बदल गई है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस हमले के जवाब में ईरान ने इजराइल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं, जिनमें बहरीन, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब और जॉर्डन जैसे अरब देश शामिल हैं। इन हमलों से अरब देश अप्रत्यक्ष रूप से पीड़ित हो रहे हैं, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डों की मौजूदगी ने उन्हें ईरानी निशाने पर ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना और शासन परिवर्तन है, लेकिन कई विश्लेषक इसे तेल संसाधनों पर नियंत्रण की लड़ाई बताते हैं। क्या यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व को युद्ध की आग में झोंक देगा? आइए, इतिहास, समयरेखा और संभावित परिणामों पर नजर डालते हैं।
संघर्ष का इतिहास: तेल, सत्ता और वैचारिक टकराव-
ईरान-अमेरिका संबंधों की जड़ें 20वीं सदी में हैं, जब तेल संसाधनों पर नियंत्रण और राजनीतिक हस्तक्षेप ने दुश्मनी की नींव रखी। ईरान, जो कभी पर्सिया के नाम से जाना जाता था, अमेरिका का करीबी सहयोगी था, लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति ने सब बदल दिया। अमेरिका को ईरान की इस्लामी सरकार ‘ग्रेट शैतान’ लगती है, जबकि ईरान अमेरिका को क्षेत्रीय हस्तक्षेप का दोषी मानता है। अरब देशों का इसमें रोल महत्वपूर्ण है, क्योंकि सऊदी अरब, यूएई जैसे सुन्नी बहुल देश ईरान के शिया प्रभाव से डरते हैं और अमेरिका के साथ गठबंधन में हैं। ईरान ने प्रॉक्सी युद्धों के जरिए (जैसे यमन में हूती विद्रोहियों को समर्थन देकर) अरब देशों को निशाना बनाया है।
अमेरिका का दावा है कि उसका लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना और क्षेत्रीय स्थिरता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि मुख्य मकसद तेल है। मध्य पूर्व में 50% से ज्यादा वैश्विक तेल भंडार हैं, और ईरान का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण तेल की वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर हमलों को ‘शांति के लिए जरूरी’ बताया, लेकिन कई रिपोर्ट्स में इसे तेल बाजार पर अमेरिकी वर्चस्व की रणनीति कहा गया है।
संघर्ष की समयरेखा: दशकों की दुश्मनी
ईरान-अमेरिका और अरब देशों के बीच संघर्ष की मुख्य घटनाएं इस प्रकार हैं:
• 1953: अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को तख्तापलट कर उखाड़ फेंका, क्योंकि उन्होंने तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया था। शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता सौंपी गई।
• 1979: ईरान में इस्लामी क्रांति। अमेरिका-समर्थित शाह को उखाड़ फेंका गया। तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा, 52 अमेरिकी बंधक बनाए गए (444 दिनों तक)। अमेरिका ने ईरान से राजनयिक संबंध तोड़े।
• 1980-1988: ईरान-इराक युद्ध। अमेरिका ने सद्दाम हुसैन के इराक को समर्थन दिया, जो ईरान पर हमला कर शत्त अल-अरब जलमार्ग और तेल-समृद्ध क्षेत्रों पर कब्जा चाहता था। युद्ध में लाखों मौतें हुईं, और अरब देशों (सऊदी, कुवैत) ने इराक की मदद की।
• 1980s: अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए। 1988 में अमेरिकी नौसेना ने ईरानी जहाजों पर हमले किए।
• 2002: अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ईरान को ‘एक्सिस ऑफ एविल’ में शामिल किया।
• 2018-2020: ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर निकाला, कड़े प्रतिबंध लगाए। 2020 में अमेरिका ने ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी को मार गिराया।
• 2023-2025: हमास-इजराइल युद्ध में ईरान ने प्रॉक्सी ग्रुप्स (हिजबुल्लाह, हूती) को समर्थन दिया। अमेरिका ने ईरान-समर्थित ठिकानों पर हमले किए।
• जनवरी 2026: ईरान में विरोध प्रदर्शनों पर दमन, ट्रंप ने हस्तक्षेप की धमकी दी।
• फरवरी 2026: अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए, खामेनेई की मौत। ईरान ने जवाब में अरब देशों में अमेरिकी अड्डों पर मिसाइलें दागीं।
अरब देशों की अप्रत्यक्ष पीड़ा
अरब देश जैसे यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत अमेरिकी सैन्य अड्डों की मेजबानी करते हैं, जो उन्हें ईरानी हमलों का निशाना बना रहा है। दुबई और दोहा में विस्फोटों से उड़ानें रद्द हुईं, बंदरगाहों पर आग लगी, और एक मौत की खबर है। ये देश ईरान के साथ व्यापार करते हैं, लेकिन अमेरिका के साथ गठबंधन ने उन्हें बीच में फंसा दिया है। तेल निर्यात प्रभावित होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है, और अरब अर्थव्यवस्थाएं पर्यटन, व्यापार में नुकसान झेल रही हैं।
संभावित परिणाम: क्षेत्रीय युद्ध या शांति?
यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व को अस्थिर कर सकता है। अगर ईरान में शासन परिवर्तन होता है, तो नई सरकार अमेरिका के साथ समझौता कर सकती है, लेकिन फिलहाल ईरान ने ‘पूर्ण हार तक’ लड़ने की धमकी दी है। तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जो भारत जैसे देशों को प्रभावित करेगा। अगर रूस या चीन हस्तक्षेप करते हैं, तो वैश्विक युद्ध का खतरा है। हालांकि, कूटनीति से बात बन सकती है, जैसा 2015 के परमाणु समझौते में हुआ था। ट्रंप ने कहा है कि हमले ‘ईरान के खतरे को खत्म’ करने के लिए हैं, लेकिन आलोचक इसे तेल की लालच बताते हैं।
यह जंग न सिर्फ ईरान-अमेरिका की, बल्कि पूरे क्षेत्र की किस्मत तय करेगी। क्या तेल की यह प्यास शांति की राह रोकेगी? दुनिया सांस थामे देख रही है।