कौशांबी में पत्रकारों पर बढ़ता दबाव! लोकतंत्र और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर खतरे की घंटी /आनन्द कुमार द्विवेदी
कौशांबी जिले में इन दिनों हालात ऐसे बनते दिखाई दे रहे हैं, जहां सच लिखने और दिखाने वालों की आवाज धीरे-धीरे दबाई जा रही है। पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वही अब दबाव, धमकी और साजिशों के बीच घिरती नजर आ रही है। जिले में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां पत्रकारों को निशाना बनाकर उनकी आवाज को कुचलने की कोशिश की जा रही है। कुछ ऐसे लोग, जो कथित तौर पर नेताओं के टुकड़ों पर पल रहे हैं, वे सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकारों को डराने और झूठे मामलों में फंसाने का काम कर रहे हैं। यह स्थिति सिर्फ एक व्यक्ति या एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे जिले में पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछना होता है, लेकिन कौशांबी में तस्वीर उलट दिखाई दे रही है। यहां सच दिखाने वाले पत्रकारों को ही कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। कई पत्रकारों का आरोप है कि जब भी वे किसी गलत काम या भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश करते हैं, तब उनके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करने या दबाव बनाने की रणनीति अपनाई जाती है। इससे साफ संकेत मिलता है कि कुछ ताकतें सच को सामने आने से रोकना चाहती हैं। पत्रकारों का कहना है कि अगर यही हालात रहे तो जिले में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग खत्म हो जाएगी और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा।
इसी क्रम में पत्रकार इश्तियाक अहमद का मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप लगाया गया कि इश्तियाक अहमद एक मारपीट की घटना में शामिल थे और इसी आधार पर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। लेकिन इस पूरे मामले में कई ऐसे सवाल उठ रहे हैं, जो पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं। पत्रकार संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस समय मारपीट की घटना बताई जा रही है, उस समय इश्तियाक अहमद एक शादी समारोह में मौजूद थे। इतना ही नहीं, उनके शादी समारोह में भोजन करते हुए फोटो भी सामने आई है, जिससे पुलिस की कहानी पर सवाल खड़े हो गए हैं।