March 6, 2026

‘गुजिया’ एक मिठाई की यात्रा तुर्की से भारत तक

मुंबई : होली का त्योहार नजदीक आता है तो हमारे देश के प्रत्येक घरों में गुजिया की खुशबू फैल जाती है। इसकी कुरकुरी परत, दानेदार मावा, मेवों की क्रंच और इलायची की सुगंध इसे केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि एक परंपरा बनाती है। क्या आप जानते हैं कि उत्तर भारत की यह विशेष मिठाई तुर्की के शाही दरबार से जुड़ी है? खाद्य इतिहासकारों का कहना है कि गुजिया का इतिहास 13वीं सदी से शुरू होता है, जब यह एक साधारण मीठा पकवान था। बुंदेलखंड और ब्रज ने इसे नया रूप दिया, और अब यह पूरे देश में विभिन्न नामों से बनाई जाती है।
गुजिया को तुर्की की प्रसिद्ध बकलावा से प्रेरित माना जाता है, जो फ्लेकी परतों और मेवों से भरी होती है। मध्य एशियाई व्यापारी और मुगल काल के रसोइए इसे भारत लाए। यहां आटे की परत को घी में तला जाने लगा, और बकलावा की मलाईदार परत की जगह मावा-मेवों को भरा गया। 13वीं सदी के ग्रंथों में ‘गूंझा’ का उल्लेख मिलता है, जो गुड़ और शहद से भरा सुखाया हुआ पकवान था।
इतिहासकारों के अनुसार, बुंदेलखंड गुजिया का जन्मस्थान है। 16वीं-17वीं सदी में यहां के राजघरानों ने इसे शाही व्यंजन बना दिया। चंद्रकला नामक गोल आकार की गुजिया आज भी लोकप्रिय है। राजाओं के रसोइयों ने मेवों और खोए को मिलाकर इसे एक विशेष स्वाद दिया। यहीं से यह ब्रज क्षेत्र में फैली और होली की परंपरा का हिस्सा बन गई। बुंदेलखंड आज भी गुजिया बनाने की कला के लिए प्रसिद्ध है।
16वीं सदी में ब्रज (मथुरा-वृंदावन) में गुजिया को भगवान कृष्ण को चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। इलायची और मेवों वाली भराई के साथ ‘चंद्रकला’ और गुजिया 56 भोग का हिस्सा बन गई। राधा रमण मंदिर जैसे प्राचीन मंदिरों में यह प्रसाद 500 साल से चल रहा है। भक्ति काल में होली के रंगों के साथ यह मिठाई खुशी और समृद्धि का प्रतीक बन गई। लोककथाएं बताती हैं कि यह कृष्ण की प्रिय मिठाई थी। 13वीं सदी में गुजिया एक साधारण गुड़-शहद वाला सुखाया पकवान था। 15वीं-16वीं सदी में मध्य एशियाई प्रभाव से मावा और मेवे जुड़े। मुगल काल में यह केसर और महंगे मेवों से शाही बन गई। आजकल चॉकलेट, केसर, और शुगर फ्री जैसे नए वर्जन भी उपलब्ध हैं। कुछ स्थानों पर इसे तलने के बजाय बेक भी किया जाता है। हर बदलाव में भारतीय स्पर्श बढ़ता गया है।
गुजिया ने पूरे देश में अपनी अलग पहचान बनाई है। महाराष्ट्र और गुजरात में इसे करंजी के नाम से जाना जाता है, जिसमें नारियल और गुड़ की भराई होती है। बिहार और झारखंड में पिड़किया सूजी-खोए की भराई वाली होती है। कर्नाटक में इसे कर्जीकाई कहा जाता है, जिसमें खसखस और नारियल डाला जाता है। दक्षिण में इसे कर्जीकाई या सोमासी के नाम से जाना जाता है। नाम अलग हैं, लेकिन त्योहार की खुशी एक समान है। गुजिया अब केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

Written by

VINOD KUMAR PANDEY

District Reporter

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