बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह ऐलान किया कि वह मुख्यमंत्री पद का त्याग कर राज्यसभा के लिए नामांकित होने जा रहे हैं। इस घोषणा ने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में हलचल मचा दी है। खास तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने इस फैसले पर आश्चर्य व्यक्त किया है।
भट्टाचार्य का कहना है कि पिछले तीन दशकों में नीतीश कुमार और उन्हें कई बार साथ आना और फिर दुश्मन बनना पड़ा है। बिहार में हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर 243 में से 202 सीटें जीती थीं। इस जीत के बाद मुख्यमंत्री का अचानक राज्यसभा जाने का निर्णय समझ से परे है।
भट्टाचार्य ने यह भी आरोप लगाया कि नीतीश कुमार को भाजपा द्वारा “ब्लैकमेल” किया गया है। उन्होंने यह बात जोर देकर कही कि यह फैसला चुनाव परिणामों को नकारता है। महागठबंधन, जिसमें उनकी पार्टी भी शामिल है, केवल 35 सीटें ही जीत सकी थी। ऐसे में नीतीश का यह कदम राजनीतिक खेल के रूप में देखा जा रहा है।
नीतीश कुमार की राजनीति में बार-बार पलटी मारने की प्रवृत्ति ने उन्हें कई आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। आलोचकों का कहना है कि यह कदम उन्हें और उनकी पार्टी के लिए एक गंभीर राजनीतिक समस्या पैदा कर सकता है। बिहार के राजनीतिक हालात में इस तरह के नाटकीय बदलावों से यह संदेह भी पैदा होता है कि क्या यह उनके लिए एक नया अध्याय है या फिर एक और राजनीतिक खेल।
इस बीच, राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नीतीश कुमार का यह निर्णय उनके लिए एक चुनौती भी हो सकता है। राज्यसभा में जाने से उन्हें एक नई भूमिका मिल सकती है, लेकिन इससे उनकी क्षेत्रीय ताकत पर असर पड़ सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे की राजनीतिक साजिशों में उनका यह कदम कैसे काम करता है।