पश्चिम बंगाल में नए गवर्नर के रूप में तमिलनाडु के गवर्नर आरएन रवि की नियुक्ति ने राज्य में राष्ट्रपति शासन की संभावनाओं पर चर्चा को हवा दी है। इस निर्णय के बाद से राजनीतिक गलियारे में कई सवाल उठने लगे हैं, खासकर विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही जब राज्य की राजनीतिक स्थिति में अस्थिरता देखी जा रही है।
आरएन रवि का कार्यकाल तमिलनाडु में सितंबर 2021 से शुरू हुआ था और इस दौरान उन्होंने कई विवादों को जन्म दिया है। उनके आलोचकों का मानना है कि वे संघीय ढांचे का सम्मान नहीं करते हैं और अक्सर राज्य सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। पिछले साल, सुप्रीम कोर्ट ने उनके उस निर्णय को पलट दिया था जिसमें उन्होंने राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था।
कोलकाता के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि रवि की बंगाल में प्रवेश से राज्य और केंद्र के बीच टकराव और बढ़ सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले ही इस मुद्दे पर सवाल उठाए थे, जब उन्होंने अचानक सीवी आनंद बोस, जो कि नवंबर 2022 से राज्य के गवर्नर थे, के इस्तीफे पर संदेह जताया। उनके पार्टी के नेताओं ने तो यहां तक कहा कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की योजना बना रही है।
इस बीच, राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार का यह कदम राजनीतिक साज़िश का हिस्सा हो सकता है, जो आगामी चुनावों को प्रभावित करने के लिए उठाया गया है। जब राज्य में चुनावी माहौल गरमाया हुआ है, ऐसे में रवि की नियुक्ति से कई सवाल उठने लगे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पश्चिम बंगाल की सत्ता को नियंत्रित करने की कोशिश के तहत लिया गया है।
राजनैतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस स्थिति में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस को अपने राजनीतिक गठबंधनों पर विचार करने की आवश्यकता है। राज्य में चुनावों के मद्देनजर यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ममता बनर्जी और उनकी पार्टी इस नए राजनीतिक वातावरण का सामना कर पाएंगी या नहीं।