✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल
यदि जनचर्चा और उपलब्ध तथ्यों पर भरोसा किया जाए, तो ग्वालियर में जो कुछ घटित हुआ है, वह केवल कानून व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सत्ता संरक्षित अराजकता का खुला प्रदर्शन प्रतीत होता है।
एक ऐसा व्यक्ति मकरंद बौद्ध, जिस पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं और जो लंबे समय से फरार बताया जा रहा है, वह न केवल खुलेआम घूमता है बल्कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पारिवारिक समारोह में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित होता है—और पुलिस उसे पहचानने के बावजूद हाथ तक नहीं लगाती।
यह कोई साधारण लापरवाही नहीं हो सकती। यह या तो डर का परिणाम है या संरक्षण का।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 249 साफ कहती है कि अपराधी को शरण देना, बचाना या गिरफ्तारी से बचने में मदद करना स्वतंत्र अपराध है। यदि यही कृत्य किसी वर्दीधारी अधिकारी द्वारा किया जाए, तो वह केवल अपराध नहीं बल्कि राज्य के भरोसे के साथ विश्वासघात है।
यहां सवाल आरोपी से भी बड़ा है—
👉 सवाल सत्ता से है।
👉 सवाल मुख्यमंत्री से है।
👉 सवाल उस प्रशासन से है जो चुनिंदा मामलों में बिजली की गति से कार्रवाई करता है और चुनिंदा मामलों में अंधा-बहरा बन जाता है।
जब एक पक्ष के लोगों को रातों-रात हिरासत में लिया जाता है, और दूसरी ओर एक फरार आरोपी थाने में जाकर एफआईआर लिखवाकर शान से बाहर निकल जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि
मध्य प्रदेश में अब कानून नहीं, संपर्क और पहचान न्याय तय कर रहे हैं।
यह भी प्रश्न उठता है कि
- क्या थाने में मौजूद सभी पुलिसकर्मी BNS,
- लोक सेवक द्वारा कर्तव्य में घोर लापरवाही,
- अपराधी को संरक्षण,
- और आपराधिक साजिश के दायरे में नहीं आते—यदि आरोप सत्य हैं?
यदि जवाब “नहीं” है, तो फिर संविधान की किताब क्यों खोली जाती है? और यदि जवाब “हाँ” है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है, जब एक ओर धार्मिक ग्रंथों को जलाने जैसे कृत्यों पर कोई कार्रवाई नहीं दिखती, और दूसरी ओर प्रतिकात्मक विरोध पर जेल के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं। यह न्याय नहीं—यह राजनीतिक चयनवाद है।
आज मध्य प्रदेश की जनता यह पूछने को मजबूर है:
क्या यह वही राज्य है जहाँ “सुशासन” का दावा किया जाता है? या फिर यह वह दौर है जहाँ वर्दी अपराधी से डरती है और नागरिक वर्दी से?
यदि समय रहते इस दोहरे मापदंड पर लगाम नहीं लगी, तो यह मान लेना पड़ेगा कि
राज्य जंगलराज की ओर नहीं बढ़ रहा—बल्कि उसे संस्थागत रूप दिया जा रहा है।
सरकार को यह समझना होगा कि, बलात्कारी, फरार अपराधी और सत्ता संरक्षित तत्व—किसी भी विचारधारा के हों—राज्य के दुश्मन होते हैं।
और जो सरकार उन्हें बचाती है, इतिहास में वही सरकार कटघरे में खड़ी होती है।
आज सवाल उठ रहे हैं।कल जवाब मांगे जाएंगे। और परसों—यदि चुप्पी बनी रही—तो जनता फैसला करेगी।

