March 12, 2026

राष्ट्र का सेवा भावी सपूत बनने के लिए आशीर्वाद मांगें भीख नहीं

राष्ट्र का सच्चा सपूत बनने के लिए हमें देश के प्रति सच्ची निष्ठा, कर्तव्य, एकता, सौहार्द, अखंडता, संप्रभुता और राष्ट्र के प्रति सही चिंतन का होना जरूरी है। हमें ऐसी सोच रखनी चाहिए कि हमारे नवयुवक सही दिशा में अग्रसर हों, स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ को धारण करें, व्यक्तिगत समस्या को छोड़कर राष्ट्र हित के बारे में सोचें, भारत माता के बारे में सोचें लेकिन आज परिस्थिति यह है कि प्रत्येक व्यक्ति निर्धन और असंपन्न मांग करता हुआ दिखाई दे रहा है।
हम अपनी अकर्तव्यता, अकर्मणता, एकता में अनेकता, संपन्नता में विपन्नता का स्वांग करते हुए हमारी मांगें पूरी हो, हमारी मांगें पूरी हों- इस नारे से आजकल समस्त दिशाएं गूंजती रहती हैं। आज जिधर देखते हैं। उधर मांगें ही मांगें। विद्यार्थी हो या अध्यापक, मजदूर हो या किसान, कर्मचारी हो या इंजीनियर सब चारों तरफ से मांगें लेकर खड़ें हैं। सब मांग रहे हैं मानों हमारे देश में भिखारियों की भीड़ एकत्र हो गई है।
जब हमारा सारा राष्ट्र मांग रहा है तब देने वाला कौन है ? क्या वह स्वतः ही उत्पन्न हो जाएगा या फिर आसमान से टपकेगा। हम मांग शासन से, प्रशासन से करते हैं और समझते हैं कि शासन हमारी समस्त मांगों को, आवश्यकताआें की पूर्ति कर देगा। प्रकारांतर से हम अपने अवचेतन में यह मान बैठे हैं कि हमारी समस्त आवश्यकताआें की पूर्ति का उत्तरदायित्व सरकार का है।
कैसी विडंबना है कि राजनीति का व्यवसाय करने वालों की सज्जबाग दिखाने वाली बातों में आकर हम निकम्मे होते जा रहे हैं। उद्यमहीनता को पुरुषार्थ का लक्षण मान बैठे हैं। लुभावने वायदों में पड़कर हमारी मानसिकता विकृत हो गई है। हम अपने स्वाभिमान को भूलकर केवल दीनता प्रदर्शित करने वाले, मांगने वाले भिखारी बन बैठे हैं।
शासन या सरकार कहां से देती है अथवा क्या देगी। क्या हमने कभी इस पर विचार किया है ? देगा कौन, देने वाली है हमारी रत्नगर्भा, हमारी भारत माता, हमारी उर्वरा भूमि, अनेक पर्वत और उनसे निकलने वाली खनिज संपदा, उनसे निकलने वाली नदियां, उनके वनों में उत्पन्न होने वाली संपदा आदि।
भारत माता के पास संपत्ति के विपुल भंडार हैं हमें इन सबसे मिलने वाला है लेनिक सरकार इनका दोहन करती है, प्रशासन उसका वितरण करता है, ऐसा करते हुए शासन-प्रशासन बिचौलिये के रूप में कितनी दलाली खा जाते हैं, इसका लेखा- जोखा किसके पास है? अनेकानेक घोटालों का पर्दाफास इसकी झलक यदा-कदा दे जाता है।
हम और आप यदि भारत माता की वेदना को सुनने, जानने का प्रयत्न करेंगें तो वह यह कहती हुई सुनाई पड़ेगी मेरे बेटों तुम्हारी आवश्यकताआें की पूर्ति के नाम पर सरकारी अफसरोें ने मेरी संपदा का मनमाना दुरूपयोग किया है। वनों को उजाड़ दिया है, नदियों को सुखा दिया है, खदानों को खाली कर दिया है तथा रासायनिक खादें डालकर उर्वरा भूमि को विषाक्त बना दिया है। यह सब किया जाता है अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए, अपने घरों को भरने के लिए परंतु नाम लिया जाता है तुम्हारा, यह तुम्हारा दुर्भाग्य है कि तुमने उनके उन कारनामों की और उपेक्षा ही नहीं की अपितु आलसी और लालची बन गये हो।
इतना पढ़ लिखकर, इतनी उपाधियां हासिल करके क्या तुम इतना भी नहीं समझते हो कि देने वाली तो मैं ही हूं। शासन- प्रशासन मेरे तो कारिन्दे और मुनीम हैं। वे तुमको क्या दे सकते हैं ? परंतु मैं कब तक दे सवूŠंगी, कब तक देती रहूंगी, खाते-खाते तो कुबेर का भी धन खत्म हो जाता है। उनका भी खजाना खाली हो जाता है। बड़े-बड़े कुएं भी सूख जाते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के मध्य एक बुलंद आवाज आई थी।
माता पड़ी है जेल में, जाकर उसे छुड़ाये कौन ?
देखें गुलाम कौम में, मुल्क के काम आये कौन ?
इस आवाज को सुनकर अनगिनत नौनिहाल निकल कर आ गये थे परंतु आज मेरी आवाज सुनने वाले बेटों का अभाव हो गया है। आज परिस्थिति यह है कि प्रत्येक व्यक्ति निर्धन और संपन्न मांग करता हुआ दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि पूरा भारत वर्ष दीन-हीन और विपन्न हो गया है।
दूसरी ओर हम रहन, सहन के स्तर को मजबूत करने का दंभ भरते हैं और तत्संबंधी आंकड़े प्रस्तुत करते हैं। विदेशी ऋण के भरोसे हम संपन्नता का स्वांग रचते हैं संपन्नता का नाटक करते हैं।
विपन्नता के स्वांग को संपन्न बनाने के लिए धमा चौकड़ी के फेर में हम अपनी अस्मिता को भूल गये हैं। ऐसा क्यों न हो ? अपने ऋणदाता देशों के यहां हम अपनी राष्ट्रीय स्वाभिमान को गिरवी जो रख दिया है। राष्ट्रीय अस्मिता की आत्महत्या का ऐसा उदाहरण विश्व इतिहास में खोजने पर भी नहीं मिलेगा।
एक ओर भारतीय स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती का समय पूरा हो चुका है लेकिन स्वर्ण जयंती मनाने के नाम पर स्वर्ण वर्षा कर रहे हैं और दूसरी और अपनी भूखमरी के नारे लगाकर आंदोलन कर रहे हैं। कुल जमा स्वार्थ की रोकड़ बाकी है। स्वर्ण जयंती के उत्सव सरकारी जश्न बनकर रह गये हैं। अपनी गरीबी एवं दीनता को मिटाने के लिए हमने अपनी आंखें बहुउ­ेशीय विदेशी कंपनियों की दीवारों पर लगा दी है।
आज आवश्यकता इस बात की है हमारे नवयुवक नये सिरे से चिंतन करें कि अपनी भारत माता को हम क्या दे सकते हैं। हम उसकी संपदा की लूट की योजनाआें को निरस्त करके उसकी लाज और उसकी अस्मिता को बचाने की बात करें। मेरे शांत मन ने भारत माता की चिक्कार को, करुण-क्रंदन को, व्यथा को सुना है। आप चाहेंगें तो आप भी सुन सकते हैं।
जिसके कारण समस्त संसार इन सभी लोगों को नमन करता था राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोष आदि को जन्म देने वाली भारत माता को बन्ध्या समझ लिया गया है। जिस महान गौरव के कारण भारत सोने की चिंडि़या कहा जाता था आज वह नाम, वह सम्मान कहां है? है कोई साहसी व्यक्ति जो भारत को उसके गौरव को, उसके मान प्रतिष्ठा को, उसके प्रेम को, उसके सम्मान को, उसकी संस्कृति को, उसकी शक्ति को वापस दिला सके। जिसके कारण उसको नमन किया जा सके।
किसी राष्ट्र की शक्ति की परख इससे नहीं होती है कि उसके कोषागार में कितना धन जमा है और न इस पर ही निर्भर करता है कि उस राष्ट्र ने अपने बचाव के लिए कितनी किले बंदी कर रखी है और न इस पर निर्भर करता है कि उस देश की अट्टालिकाएं कितनी भव्य और गगनचुंबी हैं। वरन किसी देश की शक्ति का मूल आधार तो केवल यह है कि उस देश के सपूत कितने जागृत हैं, कितने पुरुषार्थी हैं, कितने चरित्रवान हैं, राष्ट्रहित में हमारी भावना कितनी बलवती है। हमारा राष्ट्र के प्रति समर्पण कितना है। जिस राष्ट्र के सपूत इस प्रकार की विचार धारा लिये हुए होंगे उस राष्ट्र की रक्षा तो उनके सोचने मात्र से ही हो जाएगी।
आज ज्यादातर सुनने को मिलता है और उन कथनों को लेकर वाद-विवाद, प्रतियोगिताएं भी होती रहती हैं कि हमारे देश में चरित्र नाम की कोई वस्तु नहीं रह गई है। नैतिक पतन हमारी राष्ट्रीयता की समस्या बन गई है। कहीं कोई अनुशासन नहीं रह गया है। चारों ओर स्वार्थपरता, लूट-घसोट, छीना-झपटी, हत्या-बलात्कार, अपहरण आदि का ही बोलबाला है। इतना ही नहीं विदेशी पत्रकार भी भारत के बारे में चर्चा करना, अपराधियों के बारे में लिखने के लिए समान अधिकार चाहते हैं।
हम चाहते हैं कि हमारे नवयुवक अपना स्वार्थ, अपनी व्यक्तिगत समस्या, अनुशासन हीनता को छोड़कर राष्ट्रीयता के बारे में, देश के बारे में, भारत माता के बारे में सोचते हुए यह संकल्प लें कि भारत माता की अस्मिता एवं लज्जा की रक्षा को ही हम अपने जीवन का सर्वोपरी उ­ेश्य मानेंगें, उससे मांगना बंद करेंगें। यह विचार करें कि हम अपनी माता के प्रति क्या सेवा कर रहे हैं या क्या सेवा कर सकते हैं ?
हमें याद रखना चाहिए कि मांग करना शोषण करने के समान है जो हाथ उत्पादन, अर्जन एवं दान देने के लिए आगे बढ़ाना है वह सर्जनहारे के प्रति अपराध है। मांगना ही है तो राष्ट्र के लिए, देश के लिए, भारत माता के लिए एक सच्चा सपूत बनने के लिए आशीर्वाद मांगें भीख नहीं। – विनोद कुमार पाण्डेय

Written by

VINOD KUMAR PANDEY

District Reporter

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