चुनाव आयोग ने 28 फ़रवरी को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत अंतिम सूची जारी कर दी है.
लेकिन लाखों मतदाता अब भी अपने नाम के सूची में शामिल होने का इंतज़ार कर रहे हैं, जिससे अंतिम सूची के जारी होने के बावजूद यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है.
लगभग 50 लाख मतदाताओं के नाम अब भी सूची में मंज़ूरी के इंतज़ार में हैं. समय की कमी और लंबित मामलों की भारी संख्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना पड़ा.
अदालत के निर्देश पर पश्चिम बंगाल के साथ-साथ झारखंड और ओडिशा से भी न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की गई है, ताकि पुनरीक्षण की रफ़्तार बढ़ाई जा सके.चुनाव आयोग के मुताबिक़, एसआईआर से जुड़े न्यायिक फ़ैसले लेने के लिए कुल 530 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया है, जिनमें से लगभग 280 अधिकारी राज्य के 23 ज़िलों में ज़मीनी स्तर पर काम शुरू कर चुके हैं.
इस पूरी कवायद का सबसे अहम संदर्भ समय है. चुनाव आयोग के अनुसार फ़ाइनल मतदाता सूची 28 फ़रवरी तक प्रकाशित किया जाना था, जबकि क़रीब 60 लाख नाम पर अब भी न्यायिक फ़ैसला लेना बाक़ी है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि एक फ़ाइनल लिस्ट के बाद भी और लिस्ट जारी की जाएगी, ताकि फ़ैसला होने पर योग्य मतदाताओं को सूची में शामिल किया जा सके.लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह एक जल्दबाज़ी वाली परंपरा बनती जा रही है, जिसमें पारदर्शिता और भरोसे दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
मतदाता सूची के अनुसार राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या 6,44,52,609 है. इनमें से 60,06,675 नाम अब भी जाँच और निर्णय की प्रक्रिया में रखे गए हैं, जबकि 5,46,053 नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं.
अधिकारियों के मुताबिक़ जांच के दायरे में रखे गए नामों को आने वाले दिनों में जारी होने वाली अतिरिक्त सूचियों के ज़रिये जोड़ा जा सकता है.16 दिसंबर को ड्राफ़्ट इलेक्टोरल रोल में कुल 7.08 करोड़ मतदाताओं के नाम थे, लेकिन इसके साथ ही यह भी सामने आया कि 58 लाख से ज़्यादा नाम मृत, पलायन कर जाने वाले या अनुपस्थित बताकर हटा दिए गए.
इसके अलावा लगभग 50–60 लाख मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर चिन्हित किया गया, जिनके नामों पर अंतिम फ़ैसला बाकी है.
तार्किक विसंगति या लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी मुख्य रूप से मामूली मुद्दों से जुड़ी हैं, जैसे नामों की स्पेलिंग में छोटे अंतर (जैसे बंगाली से अंग्रेजी अनुवाद की गलतियां), वोटर और पैरेंट्स के बीच उम्र का फ़ासला कम होना, और 2002 की वोटर लिस्ट से माता-पिता के नाम या परिवारिक संबंधों में अंतर.
चुनाव आयोग इन्हें ‘मामूली’ या समझाने योग्य मानता है, जो अक्सर सॉफ़्टवेयर की सीमाओं या आम नामकरण की आदतों से आती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की है ताकि प्रभावित वोटर दस्तावेज़ जमा करके अपने केस साफ़ कर सकें.पश्चिम बंगाल के चीफ़ इलेक्टोरल ऑफ़िसर मनोज कुमार अग्रवाल के अनुसार, मतदाता सूची में जो 60 लाख नाम फ़ैसले के इंतज़ार में है, उन्हें ‘अंडर एजुडिकेशन’ के रूप में दर्शाया जाएगा.
जबकि जिन मामलों में डिलीशन हुआ है, उन्हें ‘डिलीटेड’ लिखा जाएगा.” उन्होंने यह भी कहा कि यह पहली बार है जब कोई फ़ाइनल इलेक्टोरल रोल इस तरह से प्रकाशित किया जा रहा है.
‘अंडर एजुडिकेशन’ वे नाम हैं जिन पर चुनाव आयोग स्पष्ट फ़ैसला नहीं ले पाया है. अब ये नाम मतदाता सूची में शामिल होंगे या नहीं, इसका निर्णय न्यायिक अधिकारी करेंगे.चुनाव आयोग का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक़ पूरी प्रक्रिया चल रही है और चुनाव के नामांकन की आख़िरी तारीख़ तक लिस्ट के ज़रिए नाम जोड़े जाते रहेंगे. आयोग का तर्क है कि किसी भी योग्य मतदाता को वंचित नहीं किया जाएगा.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस इस दावे से सहमत नहीं है. टीएमसी सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने बीबीसी हिंदी से कहा, “पहले चुनाव आयोग अकेले फ़ैसले कर रहा था. अब हर विवाद न्यायिक अधिकारी तय करेंगे. असल में यह पहली बार है जब इलेक्टोरल रोल से जुड़ी ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग से छीन ली गई है.”
उनके मुताबिक इससे परेशानी बढ़ेगी क्योंकि पहले एक लिस्ट आएगी और फिर न्यायिक फ़ैसलों के बाद दूसरी लिस्ट.
कोलकाता की रिसर्च संस्था प्रातिची इंस्टीट्यूट से जुड़े शोधकर्ता मोइदुल इस्लाम कहते हैं, “चुनाव आयोग के इतिहास में यह पहली बार है जब कोई दूसरी संस्था उसकी तरफ़ से काम कर रही है. ज्यूडिशियरी सीधे दख़ल दे रही है और आयोग के काम को गाइड कर रही है. यह पूरी तरह अभूतपूर्व है.”पश्चिम बंगाल में एसआईआर ऐसे समय चल रहा है जब राज्य में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं.
राज्य की डेमोग्राफ़ी जटिल है. धार्मिक विविधता, शहरी-ग्रामीण अंतर और बड़े पैमाने पर आंतरिक इमिग्रेशन इस प्रक्रिया को और कठिन बनाते हैं.
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक ‘तार्किक विसंगति’ के मामले सीमावर्ती इलाक़ों में सामने आए हैं, जहां दस्तावेज़ों रिकॉर्ड पहले से ही कमज़ोर रहे हैं.