अमेरिका और इसराइल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों, और उसके जवाब में ईरान की कार्रवाई ने अब तक कई नागरिकों की जान ले ली है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस जंग की निंदा की और दोनों पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील भी की.
दोनों पक्ष दावा कर रहे हैं कि वे सही हैं, लेकिन यह तय करने के लिए कि ईरान पर हुए शुरुआती हमले क़ानूनी थे या नहीं, हमें पीछे झांकना होगा.
हमें अंतरराष्ट्रीय क़ानून के उन मानकों को फिर से देखना होगा जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध की भयावह घटनाओं के बाद बनाया गया था और जिन पर ज़्यादातर देशों ने सहमति जताई थी.
28 फ़रवरी को जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर बमबारी शुरू की, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर आरोप लगाया कि वह ऐसे परमाणु हथियार बना रहा है जो अमेरिकी सहयोगियों के लिए ख़तरा हैं और ‘जल्द ही अमेरिका तक पहुंच सकते हैं.’हालांकि, 2 मार्च को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि प्रशासन को पता था कि इसराइल ईरान के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने वाला है और ईरान इसके बाद अमेरिका को भी निशाना बनाता, इस वजह से ‘अमेरिका को उस पर हमला करने की पहल करनी पड़ी.’ईरान ने इसके जवाब में इसराइल और उन मध्य पूर्वी देशों पर बमबारी की, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, और इसे आत्मरक्षा बताया.
इस जंग में हताहतों की संख्या लगातार बढ़ रही है. ईरानी रेड क्रेसेंट सोसाइटी के मुताबिक, ईरान में 780 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. इनमें कथित तौर पर एक स्कूल पर हुए अमेरिका-इसराइल के हमले में मारी गईं 165 लड़कियां और स्टाफ भी शामिल हैं. हालांकि अमेरिका और इसराइल ने अब तक नहीं माना है कि ये हमला उन्होंने किया.
लेबनान में भी सोमवार को हुए इसराइली हमलों में 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई.
दूसरी तरफ़, इसराइल और अन्य खाड़ी देशों में छह अमेरिकी सैनिकों समेत कई दर्जन लोग मारे गए हैं.बीबीसी ने जिन क़ानूनी विशेषज्ञों से बात की उनका कहना है कि अमेरिका-इसराइल की ओर से किए गए शुरुआती हमलों के लिए क़ानूनी शर्तें पूरी होती नहीं दिखतीं, लेकिन साथ ही, ईरान की जवाबी कार्रवाई भी अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन हो सकती है.
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर, जो इस संस्था का मूल दस्तावेज़ है, के तहत किसी देश को आम तौर पर दूसरे देश पर सैन्य बल का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होती, जब तक कोई विशिष्ट अपवाद लागू न हो.
इसमें दो बड़े प्रावधान अहम हैं:
अनुच्छेद 2(4): किसी अन्य देश के ख़िलाफ़ बल प्रयोग या उसकी धमकी पर प्रतिबंध लगाता है.
अनुच्छेद 51: किसी सशस्त्र हमले के जवाब में बल का इस्तेमाल करने की इजाज़त देता है.इसलिए असली कानूनी सवाल यह है कि क्या ईरान कोई हमले का ख़तरा पैदा कर रहा था?
ब्रिटन के इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड लीगल स्टडीज़ की अंतरराष्ट्रीय क़ानून विशेषज्ञ सूज़न ब्रो कहती हैं कि वैध आत्मरक्षा के लिए ‘हमले की आशंका का ठोस, निर्विवाद सबूत’ होना चाहिए. साथ ही वह कहती हैं कि उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा.
प्रसिद्ध मानवाधिकार वकील सर ज्योफ़्री नाइस भी इससे सहमत हैं. उन्होंने 1998 से 2006 तक अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल में पूर्व यूगोस्लाव राष्ट्रपति स्लोबोदन मिलोशेविच के ख़िलाफ़ अभियोजन का नेतृत्व किया था.
वह कहते हैं, “अब तक कोई सबूत पेश नहीं किया गया.”
“इस बात की पूरी संभावना है कि युद्ध की शुरुआत ही ग़ैर क़ानूनी थी.”
अमेरिका के भीतर भी, कई डेमोक्रेट नेताओं का कहना है कि ईरान के ख़िलाफ़ यह अभियान अवैध है, क्योंकि युद्ध की घोषणा करने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है.
हालांकि, कमांडर इन चीफ़ होने के नाते, अमेरिका के राष्ट्रपति, बिना किसी औपचारिक युद्ध घोषणा के कुछ सीमित सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं.राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि जून 2025 में तीन परमाणु ठिकानों पर बमबारी के बाद अमेरिका ने ईरान से बातचीत की कोशिश की थी, लेकिन ईरान ने ‘हर मौके पर अपने परमाणु इरादों से पीछे हटने से इनकार कर दिया.’
उनका तर्क था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा खड़ा कर रहा है और ऐसी लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर रहा है जो अमेरिकी सहयोगियों, विदेशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों और अंततः अमेरिकी ज़मीन तक को निशाना बना सकती हैं.
अमेरिका में ट्रंप के पहले प्रशासन के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप की खुफ़िया और सुरक्षा टीम में शामिल रहे एज्रा कोहेन ने बीबीसी से कहा, “ऐसी काफी रिपोर्ट मौजूद हैं… कि अमेरिका या इसराइल के आगे बढ़ने का फैसला करने से पहले ही ईरानी अपनी मिसाइल फोर्सेस को हमले के लिए तैयार कर रहे थे.”
इसी बीच, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के डायरेक्टर राफ़ेल ग्रोसी ने सोमवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ईरान का ‘बहुत बड़ा और महत्वाकांक्षी परमाणु कार्यक्रम’ है, लेकिन उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा जो ‘परमाणु हथियार बनाने की एक संगठित योजना’ की ओर इशारा करे.
अमेरिका की डिफ़ेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) की मई 2025 की एक रिपोर्ट का निष्कर्ष था कि ईरान कई साल तक लंबी दूरी की मिसाइलें नहीं बना सकता.विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि ट्रंप का पिछला दावा- कि पिछले साल 12 दिन चले इसराइल ईरान युद्ध में ईरान का परमाणु कार्यक्रम ‘पूरी तरह नेस्तनाबूत कर दिया गया था’- एक संभावित ख़तरे के विचार से मेल नहीं खाता.अंतरराष्ट्रीय क़ानून में सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि संभावित ख़तरे की व्याख्या कितनी संकरी या कितनी व्यापक होनी चाहिए.
केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय क़ानून विशेषज्ञ मार्क वेलर बताते हैं कि परंपरागत तौर पर, संभावित से अर्थ “उस अंतिम संभावित क्षण से होता है जब आप किसी ऐसे हमले को रोक सकते हैं जो निश्चित रूप से आपकी ज़मीन पर होने वाला है”.
सूज़न ब्रो कहती हैं कि लंबे समय से यह बहस चल रही है कि किसी देश के आत्मरक्षा में किए गए बल प्रयोग को कब वैध माना जाए: कुछ कहते हैं कि जब हमला शुरू हो चुका हो, तब; जबकि दूसरे मानते हैं कि अगर विश्वसनीय सबूत हैं कि हमला बहुत जल्द होने वाला है, तो उसे रोकने के लिए की गई कार्रवाई जायज़ हो सकती है.
लेकिन इसके साथ ही वह ज़ोर देकर कहती हैं: “पर यह (जल्द)10 साल बाद नहीं हो सकता.”
सूज़न ब्रो कहती हैं कि वैध आत्मरक्षा के लिए दो और शर्तें भी ज़रूरी हैं: ज़रूरत “यानी ऐसे हालात जिसमें कोई दूसरा विकल्प बचा ही न हो.” और आनुपातिकता यानी जवाबी कार्रवाई उतनी ही हो जितनी बिल्कुल ज़रूरी हो.
वेलर और ब्रो दोनों मानते हैं कि 1967 में छह दिवसीय युद्ध के दौरान मिस्र के ख़िलाफ़ इसराइल का हमला आधुनिक इतिहास में पूर्वानुमान के आधार पर आत्मरक्षा के सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है.
ब्रो कहती हैं, उस समय बहुत से लोग मानते थे कि मिस्र की सेना सीमा पर इकट्ठी होकर हमला करने वाली है.
लेकिन वह यह भी कहती हैं कि तब भी इसराइल की कार्रवाई विवादित मानी गई थी.कई विशेषज्ञों का मानना है कि हो सकता है कि ईरान ने भी अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन किया हो.
वेलर कहते हैं कि ईरान ने गल्फ देशों पर जो ‘अंधाधुंध हमले’ किए, वे अंतरराष्ट्रीय क़ानून के ख़िलाफ़ हैं.
सर ज्योफ़्री नाइस कहते हैं कि भले ही ईरान इसे आत्मरक्षा बताए, लेकिन जवाब आनुपातिक होना चाहिए. आनुपातिकता का मतलब है- सैन्य लक्ष्य और उससे होने वाले संभावित नागरिक नुक़सान के बीच संतुलन.
उनके अनुसार, “ईरान जो मिसाइलें इस्तेमाल कर रहा है, जिनकी दिशा और लक्ष्य सटीक नहीं हैं, उन्हें आसानी से अनुपातहीन और इसलिए ग़ैर क़ानूनी कहा जा सकता है.”
ब्रो भी इससे सहमत हैं और उदाहरण देती हैं कि दुबई के मशहूर फेयरमोंट होटल पर ईरानी हमला हुआ, “वह कोई सैन्य लक्ष्य नहीं, बल्कि नागरिक ढांचा था.”विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि ग़ैर क़ानूनी बल प्रयोग को साफ़-साफ़ चिह्नित नहीं किया गया, तो समय के साथ अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था कमज़ोर पड़ सकती है.
ब्रो चेतावनी देती हैं कि इससे दूसरे देशों को भी इसी तरह का तर्क देकर बल प्रयोग करने का मौका मिल जाएगा- उदाहरण के लिए चीन, जो ताइवान को अपना एक- अलग हो चुका- प्रांत मानता है.
वह कहती हैं, “अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए इससे बड़ा ख़तरा कुछ नहीं कि हम ग़ैर क़ानूनी बल प्रयोग को स्वीकार कर लें.”
चैटम हाउस के लिए लिखे एक लेख में, वेलर चेतावनी देते हैं कि अगर ऐसा हुआ, तो ‘भविष्य में रूस की और आक्रामकता या चीन के विस्तारवादी कदमों’ का विरोध करना मुश्किल हो जाएगा, और ऐसा करने पर ‘दोहरे मापदंड अपनाने और पाखंड करने का आरोप लगेगा.’ फिर अमेरिका समेत अन्य देशों को “पछतावा होगा कि इसकी वजह से क़ानूनी और नैतिक विश्वसनीयता खो दी गई है.”
अगर ताकतवर देश बार-बार बिना परिणाम भुगते अंतरराष्ट्रीय क़ानून तोड़ते रहे, तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था ढह सकती है, और उसकी जगह ‘ताक़तवर का ही क़ानून’ वाली दुनिया ले सकती है.