कल्कि के घोड़े का अर्जुन के शंख से क्या संबंध है?इस बारे में जानकारी उपलब्ध है की भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के सफेद घोड़े का नाम ‘देवदत्त’ है, और अर्जुन के शंख का नाम भी ‘देवदत्त’ है, जो उन्हें इंद्र ने दिया था। यह संबंध मुख्य रूप से ‘देवताओं द्वारा दिया गया’ (God-given) होने का प्रतीक है, जो दोनों के दिव्य मिशन (धर्म की पुनर्स्थापना) को दर्शाता है।
अपनी प्रतिक्रिया पर विजय पा लो, जीवन अपने आप संवर जाएगा।
सच्ची ताकत परिस्थितियों को नियंत्रित करने में नहीं, बल्कि अपनी प्रतिक्रिया को संभालने में है। जीवन कभी आलोचना देगा, कभी गुस्सा, कभी दबाव। लेकिन जब आप रुककर सोचते हैं और समझदारी से प्रतिक्रिया देते हैं, तब आप हालात से ऊपर उठ जाते हैं।
#Kingrethink
हमारे कर्मों के अनुसार हमें विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त होते हैं और हम एक शरीर से दूसरे शरीर में जन्म लेते हैं। फिर एक बार जन्म लेने के बाद, हम कुछ समय तक जीवित रहते हैं, शरीर का विकास करते हैं, फिर कुछ उप-उत्पाद उत्पन्न करते हैं, फिर शरीर क्षीण होता जाता है और अंत में विलीन हो जाता है।
(श्रील प्रभुपाद,कलकत्ता – 24 फरवरी, 1972)
हम विद्यालय जाते हैं, महाविद्यालय जाते हैं, ताकि श्रेष्ठ व्यक्ति से ज्ञान प्राप्त कर सकें। यही हमारी प्रक्रिया है। यही पूर्ण ज्ञान है। ज्ञान का निर्माण नहीं किया जा सकता। इसलिए भगवद्गीता से ही सर्वथा वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यदि आप इसका गहन अध्ययन करें, तो यह अत्यंत सरल और परिपूर्ण है।
(श्रील प्रभुपाद,बंबई,24 फरवरी 1974)
एक व्यक्ति जीवन भर जी-जान से अपने परिवार की सेवा करता है और वृद्ध होने पर यदि वह अपनी पत्नी की अनुमति लेता है, ‘मेरी प्रिय पत्नी, मैंने इतनी सेवा की है,अब मुझे संन्यास लेने दो,’ पत्नी कभी भी इसकी अनुमति नहीं देगी। वह कहेगी, ‘तुमने किया ही क्या है? यह लड़का अभी तक बेरोजगार है; इस लड़की का अभी तक विवाह नहीं हुआ। तुम कैसे संन्यास ले सकते हो? तुम ऐसा नहीं कर सकते।’ तो वास्तव में वह पत्नी का दास है, किन्तु वह सोचता है, ‘मैं परिवार का स्वामी हूँ।’ इसे माया कहते हैं।
(श्रील प्रभुपाद,बम्बई, 24 फरवरी 1975 )
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-कृष्ण पुस्तक
“यदि तुम मुझे जानना चाहते हो, तो मेरी पुस्तकें पढ़ो।”**
> **पुस्तक वितरण बृहत्-मृदंग है – यह निरंतर बढ़ता रहेगा।”**
कृष्णभावनामृत में अपनी यात्रा की शुरुआत करने वाले **शुरुआती** लोगों के लिए, सबसे सुरक्षित आधार कृष्ण से सीधे सुनना और प्रामाणिक शास्त्रों का अध्ययन करना है।
“जहाँ कहीं कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन होता है, चाहे वह उपेक्षा से ही क्यों न हो, वहाँ से सारे बुरे तत्त्व- डाइनें, भूत-प्रेत तथा संकट-तुरन्त भाग जाते हैं।”
Hare Krishna 💫🕉️
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श्रीमद्-भागवतम् 4.30.24 के अनुसार, भक्त प्रचेताओं ने भगवान विष्णु (वासुदेव) की स्तुति की, उन्हें भौतिक प्रभावों से स्वतंत्र, भक्तों के दुखों को दूर करने वाला और सर्वव्यापी माना। यह श्लोक भगवान को वासुदेव, कृष्ण और गुणों के अवतारों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) से परे विशुद्ध-सत्व रूप में वर्णित करता है, जो भक्तों का प्रभाव बढ़ाते हैं।
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Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 2 Verse 19👇
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्र्चैनं मन्यते हतम् |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || १९ ||
यः – जो; एनम् – इसको; वेत्ति – जानता है; हन्तारम् – मारने वाला; यः – जो; च – भी; एनम् – इसे; मन्यते – मानता है; हतम् – मरा हुआ; उभौ – दोनों; तौ – वे; न – कभी नहीं; विजानीतः – जानते है; न – कभी नहीं; अयम् – यह; हन्ति – मारता है; न – नहीं; हन्यते – मारा जाता है |
Translation👇
जो इस जीवात्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसे मरा हुआ समझता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं, क्योंकि आत्मा न तो मरता है और न मारा जाता है |
Commentary👇
जब देहधारी जीव को किसी घातक हथियार से आघात पहुँचाया जाता है तो यह समझ लेना चाहिए कि शरीर के भीतर जीवात्मा मरा नहीं | आत्मा इतना सूक्ष्म है कि इसे किसी तरह के भौतिक हथियार से मार पाना असम्भव है, जैसा कि अगले श्लोकों से स्पष्ट हो जायेगा | न ही जीवात्मा अपने आध्यात्मिक स्वरूप के कारण वध्य है | जिसे मारा जाता है या जिसे मरा हुआ समझा जाता है वह केवल शरीर होता है | किन्तु इसका तात्पर्य शरीर के वध को प्रोत्साहित करना नहीं है | वैदिक आदेश है – मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि – किसी भी जीव की हिंसा न करो | न ही ‘जीवात्मा अवध्य है’ का अर्थ यह है कि पशु-हिंसा को प्रोत्साहन दिया जाय | किसी भी जीव के शरीर की अनधिकार हत्या करना निंद्य है और राज्य तथा भगवद्विधान के द्वारा दण्डनीय है | किन्तु अर्जुन को तो धर्म के नियमानुसार मारने के लिए नियुक्त किया जा रहा था, किसी पागलपनवश नहीं |
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Jeetendra Sharan
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