आस्था का महाकुंभ या व्यवस्था की अग्निपरीक्षा? गयाजी में एक ही दिन में 4.25 लाख का सैलाब, AI तकनीक बनी ढाल; पर कतारों में हांफ रही बुनियादी व्यवस्था,
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गयाजी धाम (बिहार): मोक्षदायिनी फल्गु के तट और विष्णुपद के पावन प्रांगण में आस्था का ऐसा महासमुद्र उमड़ा है, जिसने पिछले कई रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं।
पितृपक्ष महासंगम 2026 के ताजा प्रशासनिक आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 24 घंटे के भीतर 4 लाख 25 हजार तीर्थयात्रियों ने गयाजी की धरती पर कदम रखा।
इसके साथ ही अब तक कुल पिंडदानियों का आंकड़ा 8 लाख 85 हजार के पार पहुंच चुका है।
प्रेतशिला की दुर्गम सीढ़ियों से लेकर रामशिला, सीताकुंड, देवघाट और विष्णुपद मंदिर तक तिल रखने की जगह नहीं है।
तस्वीरें साफ बयां कर रही हैं कि शेड के नीचे दूर-दूर तक केवल सफेद वस्त्रों में बैठे पिंडदानी अपने पितरों के उद्धार के लिए तिल, जौ और कुश हाथ में लिए तर्पण कर रहे हैं। परंतु इस अगाध श्रद्धा के समानांतर प्रशासनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं और जमीनी प्रबंधन क्या वाकई इस जनसैलाब को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं?
1. 17 हजार से अधिक मरीज एक दिन में: मौसम का कहर या बदइंतजामी?
बुलेटिन का सबसे चौंकाने वाला और चिंताजनक पहलू स्वास्थ्य सेवाओं का आंकड़ा है। आज के दिन अकेले 17,339 श्रद्धालुओं को मेडिकल उपचार लेना पड़ा। अब तक कुल 28,810 लोगों ने इलाज कराया है, यानी आधे से अधिक मरीज केवल एक दिन में प्राथमिक उपचार केंद्रों पर पहुंचे।
भीषण उमस, घंटों लंबी कतारें, पेयजल की मारामारी और वृद्ध तीर्थयात्रियों की शारीरिक सीमाएं जवाब दे रही हैं। हालांकि स्वास्थ्य कर्मियों का त्वरित इलाज राहत दे रहा है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या घाटों और वेदी स्थलों पर छाया, वेंटिलेशन और ओआरएस/पेयजल की आपूर्ति उस पैमाने पर है, जिस पैमाने पर भीड़ उमड़ रही है?
अगर एक दिन में 17 हजार लोग मेडिकल उपचार के लिए पहुंच रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर 'हीट-स्ट्रेस' और थकावट से निपटने के उपायों की समीक्षा की मांग करता है।
2. आस्था के साथ हाई-टेक प्रयोग: 'AI' अनुवादक बना मददगार
इस मेले की एक प्रमुख पहल के रूप में सूचना प्रौद्योगिकी सामने आई है। गैर-हिंदी भाषी राज्यों—विशेषकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र—से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए भाषा हमेशा से बड़ी दीवार रही है। आज एआई (AI) आधारित भाषा अनुवाद प्रणाली के जरिए 12,480 तीर्थयात्रियों की समस्याओं का तत्काल समाधान किया गया।
स्थानीय भाषा न जानने के कारण बिछड़ने या ठगी के शिकार होने वाले यात्रियों के लिए यह एआई तकनीक एक सुरक्षा कवच सिद्ध हुई है। इसके साथ ही आज 421 बच्चों और बुजुर्गों को बारकोड/पहचान वाले रिस्ट बैंड पहनाए गए, जिससे गुमशुदगी का खतरा कम हुआ है। खोया-पाया सेल ने भी तत्परता दिखाते हुए आज 29 बिछड़े परिजनों को मिलाया (कुल आंकड़ा 130)।
तकनीक का यह इस्तेमाल प्रशासन की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
3. टेंट सिटी और गंगाजल: राहत की बयार, पर शिकायतें भी दोगुनी
गांधी मैदान स्थित विशाल टेंट सिटी में आज 1,023 श्रद्धालुओं ने सुरक्षित आवासन किया, जिससे कुल संख्या 2,015 हो गई। वहीं 'हर घर गंगाजल' की तर्ज पर आज 3,550 पैकेट शुद्ध गंगाजल का वितरण पिंडदानियों के बीच किया गया (अब तक कुल 8,448 पैकेट)।
पर्यावरण और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए 'एक पेड़ पूर्वजों के नाम' अभियान के तहत आज पितृवाटिका में 33 पौधे रोपे गए (अब तक 107 पौधे)।
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कंट्रोल रूम में आज अकेले 265 शिकायतें दर्ज हुईं, जिससे कुल शिकायतों का आंकड़ा 542 पहुंच गया। आधी से अधिक शिकायतें एक ही दिन में आना इस बात का संकेत है कि भीड़ के अप्रत्याशित दबाव के आगे स्थानीय सफाई, ट्रैफिक रूट, शौचालय व्यवस्था और कुछ निजी पंडों/दलालों की मनमानी को लेकर यात्रियों में रोष बढ़ा है।
निष्कर्ष और चेतावनी
पितृपक्ष मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बिहार के आतिथ्य, सुशासन और आपदा-प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा है।
अगले कुछ दिनों में यह भीड़ 10 से 15 लाख के पार जाने की संभावना है।
प्रशासन को अब कागजी आंकड़ों से आगे बढ़कर तीन मोर्चों पर प्राथमिकता के साथ काम करना होगा।
वेदी स्थलों पर मेडिकल रिस्पॉन्स टीम की संख्या दोगुनी करना, ताकि कतारों में खड़े वृद्ध बेहोश न हों।
कंट्रोल रूम की शिकायतों का 15 मिनट के भीतर निस्तारण, ताकि यात्रियों का विश्वास तंत्र पर बना रहे।
व्हीलचेयर (आज केवल 110 उपयोग) और ई-रिक्शा की उपलब्धता बढ़ाना, क्योंकि लाखों की भीड़ में निशक्तजनों और 70+ उम्र के बुजुर्गों के लिए घाटों तक पहुंचना आज भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
गयाजी में आए हर पिंडदानी की आंख में अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष की कामना है; यह तंत्र का दायित्व है कि उनकी इस श्रद्धा को अव्यवस्था का दंश न झेलना पड़े।