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आगरा जिला अस्पताल में बंदरों का आतंक

By JAHID KHAN • 2026-09-26 11:08 • 4 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
आगरा जिला अस्पताल में बंदरों का आतंक

आगरा ब्रेकिंग

आगरा जिला अस्पताल में बंदरों का आतंक: इलाज कराने आए मरीजों पर मंडराया खतरा, गलियारों में छिप-छिपकर चलने को मजबूर तीमारदार, तोड़ा युवती का मोबाइल

ताजनगरी आगरा के प्रमुख जिला अस्पताल परिसर में स्वास्थ्य सुविधाओं से ज्यादा बंदरों का खौफ हावी है। दूर-दराज से इलाज की उम्मीद लेकर पहुँचने वाले मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल परिसर में कदम-कदम पर बंदरों के खौफ का सामना करना पड़ रहा है। शुक्रवार को अस्पताल में इलाज की व्यवस्थाओं से इतर बंदरों की हुकूमत का नज़ारा साफ देखने को मिला, जहाँ मरीज और तीमारदार अस्पताल के गलियारों में डर-डरकर और छिपकर चलने को मजबूर दिखे।

सामान और मोबाइल झपट रहे बंदर:
जिला अस्पताल के मुख्य ओपीडी मार्ग, वार्डों के बाहर और गलियारों में दर्जनों की संख्या में बंदर मंडराते रहते हैं। जैसे ही कोई तीमारदार हाथ में खाने-पीने का सामान, दवाइयों का थैला या मोबाइल लेकर निकलता है, बंदर तुरंत उन पर छलांग लगा देते हैं। नामनेर निवासी उमा ने आपबीती सुनाते हुए बताया कि बृहस्पतिवार को जब वह अपनी जांच के लिए अस्पताल आई थीं, तब उन्होंने देखा कि बंदरों के एक झुंड ने अचानक एक युवती पर हमला कर दिया और उसका मोबाइल छीनकर ज़मीन पर पटक दिया, जिससे मोबाइल पूरी तरह चकनाचूर हो गया।

दिव्यांगों और पहली बार आए मरीजों ने जताई चिंता:
अस्पताल परिसर में मौजूद मालपुरा निवासी दिव्यांग बबलू ने बताया कि वह साल 2008 से दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने और इलाज के सिलसिले में यहाँ आ रहे हैं, लेकिन इतने सालों में भी बंदरों के खौफ का कोई समाधान नहीं निकाला गया। उन्होंने कहा कि जब आम इंसान यहाँ सुरक्षित नहीं है, तो दिव्यांगों की सुरक्षा का तो भगवान ही मालिक है। वहीं पहली बार अपनी पत्नी का इलाज कराने आए मलपुरा निवासी धर्मवीर ने कहा कि अस्पताल परिसर में घूमते बंदरों को देखकर लोग चुपचाप निकल जाने की सलाह देते हैं, लेकिन अगर कोई बंदर हमला कर दे या काट ले तो इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल:
अस्पताल में आने वाले हजारों मरीजों और उनके परिजनों ने जिला प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि परिसर में लगातार बढ़ रहे बंदरों के इस आतंक पर तुरंत काबू पाया जाए। वन विभाग के सहयोग से बंदरों को पकड़वाने के लिए अभियान चलाया जाए, ताकि अस्पताल आने वाले असहाय मरीजों, महिलाओं और बच्चों को एक सुरक्षित माहौल में इलाज मिल सके।

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