'पुष्प दान' से आगे 'स्वार्थ बलिदान' तक— "दिनकर के विचारों से मगध में नवजागरण की गूँज"
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार,
गयाजी : जब प्रशासनिक कर्तव्यनिष्ठा और सांस्कृतिक चेतना का संगम एक मंच पर होता है, तब केवल प्रशासनिक आदेश जारी नहीं होते, बल्कि समाज में एक स्थायी वैचारिक क्रांति का बीज रोपा जाता है।
गया जी के ऐतिहासिक बेलागंज की पावन धरा पर 'लेट्स इंस्पायर बिहार' (LIB) के बेलागंज अध्याय द्वारा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष कार्यक्रम इसी वैचारिक पुनर्जागरण का ज्वलंत प्रमाण बना।
1. दिनकर केवल अतीत के कवि नहीं, भविष्य के मार्गदर्शक हैं:
अक्सर महापुरुषों की जयंतियाँ महज माला पहनाने और औपचारिकता तक सीमित रह जाती हैं। किंतु बेलागंज के इस मंच से आईपीएस विकास वैभव ने जिस बेबाकी और स्पष्टता के साथ दिनकर जी के दर्शन को सामने रखा, उसने सीधे समाज के मर्म को छुआ।
उनका यह उद्गार अत्यंत विचारणीय है कि "राष्ट्रकवि का स्मरण तभी सार्थक है, जब उनकी वाणी हमारे भीतर चेतना, संकल्प, त्याग और नवसृजन की प्रेरणा जागृत करे।"
दिनकर जी की कालजयी कविता 'आशा का दीपक' की पंक्तियाँ—
“और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है ।
थककर बैठ गये क्या भाई ! मंज़िल दूर नहीं है ।”
यह पंक्तियाँ केवल व्यक्तिगत संघर्ष का संबल नहीं हैं, बल्कि यह आज के उस बिहार के लिए मंत्र हैं जो निराशा, पलायन और जातिवादी संकीर्णताओं के भंवर से निकलकर अपने गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है।
2. मुंगेर से सिमरिया और अब मगध: "दिनकर हैं जीवित स्मृति, पर प्रेरणा लेता कौन है?"
साल 2017 में मुंगेर डीआईजी के पद पर रहते हुए आईपीएस विकास वैभव द्वारा रचित पंक्तियाँ जब बेलागंज के मंच से गूँजीं, तो सभागार में सन्नाटा खिंच गया।
“सिमरिया में पूछे मंदाकिनी, दिनकर क्या अब मौन है ।
चिंतित भारत भविष्य पर, मिथिला क्या पुनः गौण है ।
दिनकर हैं जीवित स्मृति, पर प्रेरणा लेता कौन है ।
यदि राष्ट्रकवि का है सम्मान, नहीं केवल पुष्प दान ।
नव युवा से आशान्वित, भारत माँगे स्वार्थ बलिदान ।
नव सृजन के निमित्त, दिनकर मार्ग माँगे अग्रप्रस्थान ।”
इन पंक्तियों का संदेश तीखा और स्पष्ट है—दिनकर को केवल 'पुष्प दान' मत दो, बल्कि उनके राष्ट्र-निर्माण के संकल्प के लिए अपने 'स्वार्थ का बलिदान' दो। आज जब युवा वर्ग छोटी-मोटी उपलब्धियों और तुच्छ स्वार्थों में उलझ जाता है, तब दिनकर की हुंकार उसे व्यापक राष्ट्रहित और सामाजिक उत्थान के लिए अग्रसर होने की चुनौती देती है।
3. मगध की धरती पर वैचारिक लामबंदी :
इस आयोजन में जहानाबाद के पूर्व सांसद डॉ. अरुण कुमार, बेलागंज विधायक मनोरमा देवी, और पूर्व आईजी उमेश सिंह की उपस्थिति दर्शाती है कि 'लेट्स इंस्पायर बिहार' केवल एक बौद्धिक क्लब नहीं है, बल्कि यह राजनीति, प्रशासन और प्रबुद्ध समाज को एक मंच पर लाकर सकारात्मक परिवर्तन का साझा ताना-बाना बुन रहा है।
बेलागंज, जो राजनीतिक रूप से मगध का संवेदनशील और ज्वलंत केंद्र माना जाता है, वहाँ दिनकर की राष्ट्रीयता, त्याग और शिक्षा-संस्कृति पर मंथन होना अपने आप में एक बड़ा सामाजिक संदेश है।
निष्कर्ष:
'लेट्स इंस्पायर बिहार' की यह मुहिम दिनकर के उसी 'हुंकार' का आधुनिक स्वरूप है, जो बिहार के युवाओं से जाति-पाति और संकीर्णताओं से ऊपर उठकर ज्ञान, समता और उद्यमिता के मार्ग पर चलने का आह्वान करती है।
दिनकर जी ने कभी लिखा था:
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध ।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ।”
बेलागंज में आयोजित यह कार्यक्रम इसी बात की गवाही देता है कि बिहार की नई पीढ़ी अब 'तटस्थ' रहने को तैयार नहीं है। राष्ट्रकवि के विचारों की मशाल लेकर "यात्रा गतिमान है", और जब तक यह चेतना अंतिम पंक्ति के युवा तक नहीं पहुँच जाती, यह अग्रप्रस्थान अनवरत जारी रहेगा।