भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक: रिकॉर्ड की दहलीज पर निगरानी तंत्र, पर सवाल अब भी जिंदा!
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ,
24सितम्बर 2026,
पटना : बिहार की नौकरशाही और प्रशासनिक व्यवस्था में वर्षों से गहरे पैर जमाए भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने जिस आक्रामकता के साथ मोर्चा खोला है, उसके आंकड़े चौंकाने वाले भी हैं और तंत्र की हकीकत को बेनकाब करने वाले भी।
महानिदेशक जितेंद्र सिंह गंगवार द्वारा साझा किए गए ताजा आंकड़े बताते हैं कि 8 सितंबर 2026 तक ही 99 ट्रैप मामलों में 99 सरकारी कर्मियों को रिश्वतखोरी के जाल में दबोचा जा चुका है।
पिछले पूरे साल (2025) में 101 ट्रैप हुए थे—यानी वर्ष समाप्त होने से चार महीने पहले ही पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त होने के कगार पर है।
यह उपलब्धि निगरानी ब्यूरो की सक्रियता का जयघोष जरूर करती है, लेकिन लोकतंत्र और सुशासन के सामने यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न भी खड़ा करती है।
क्या ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां प्रशासनिक सफाई का पैमाना हैं, या फिर यह इस बात का प्रमाण हैं कि व्यवस्था में घूसखोरी किस कदर सामान्य और बेखौफ हो चुकी है?
1. निगरानी की मुस्तैदी:
तकनीक और त्वरित रणनीति का असर,
निगरानी ब्यूरो के कार्यशैली में हालिया बदलाव निश्चित तौर पर स्वागत योग्य हैं।
शिकायतों पर तत्काल धावा दल आम जनता से सीधी हेल्पलाइन व डिजिटल माध्यमों से शिकायतें लेकर त्वरित योजना के तहत कार्रवाई की जा रही है।
एक ही दिन में कई जिलों में कार्रवाई:
जिलों में एक साथ अलग-अलग विभागों के अफसरों पर छापेमारी कर ब्यूरो ने यह संदेश दिया है कि कार्रवाई अब राजधानी तक सीमित नहीं है।
पारदर्शिता का दबाव:
सरकारी काम के बदले खुलेआम नजराना मांगने वालों के मन में कानूनी जाल (Trap) का एक मनोवैज्ञानिक डर अवश्य पैदा हुआ है।
2. सिक्का का दूसरा पहलू:
'रिकॉर्ड' किस बात का?
अगर हर दूसरे-तीसरे दिन कोई अधिकारी घूस लेते रंगेहाथ पकड़ा जा रहा है, तो इसे केवल पुलिसिया पराक्रम मानकर पीठ नहीं थपथपाई जा सकती।
यह इस कड़वी हकीकत को दर्शाता है कि
दंडात्मक कार्रवाई का खौफ नदारद है।
100 से अधिक कर्मियों के पकड़े जाने के बावजूद अगली टेबल पर बैठा कर्मचारी घूस मांगने से परहेज नहीं कर रहा।
निचले और मध्यम स्तर तक सीमित जाल:
ट्रैप केसों में अमूमन अमीन, राजस्व कर्मचारी, क्लर्क, दारोगा या कार्यपालक अभियंता जैसे चेहरे ही ज्यादा फंसते हैं।
नीतिगत फैसलों और अरबों के ठेकों की बंदरबांट करने वाली 'बड़ी मछलियां' अक्सर प्रक्रियागत पेचीदगियों की आड़ में बच निकलती हैं।
संस्थागत सुधारों का अभाव:
जब तक सरकारी सेवाओं की डिलीवरी में मानव हस्तक्षेप और फाइलों को अटकाने की व्यवस्था खत्म नहीं होगी, तब तक ट्रैप का यह रिकॉर्ड हर साल टूटता रहेगा।
3. दोषसिद्धि और स्पीडी ट्रायल की वास्तविक चुनौती
ट्रैप करना और मीडिया में सुर्खी बनाना लड़ाई का सिर्फ पहला चरण है।
लंबी कानूनी प्रक्रिया:
वर्षों तक मामलों का अदालत में लटके रहना और गवाहों का मुकर जाना भ्रष्टाचार के मामलों की सबसे कमजोर कड़ी रहा है।
विभागीय अभियोजन स्वीकृति : धारा 17A और 19 (PC Act) के तहत कई विभागों द्वारा अपने चहेते अफसरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने में महीनों और सालों की देरी की जाती है।
केवल गिरफ्तारी से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा;
जब तक पकड़े गए भ्रष्ट कर्मचारियों को त्वरित गति से सजा नहीं मिलती और उनकी अवैध संपत्ति जब्त नहीं होती, तब तक यह अभियान अधूरा रहेगा।
निष्कर्ष:
'जीरो टॉलरेंस' को नारों से निकालकर व्यवस्था का अंग बनाना होगा
निगरानी ब्यूरो की तेजी प्रशंसनीय है, और इस रफ्तार से ब्यूरो 2026 में कार्रवाई का सर्वकालिक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।
लेकिन असली सफलता का दिन वह नहीं होगा जब ट्रैप के मामलों का शतक या दोहरा शतक लगेगा; असली सफलता उस दिन होगी जब निगरानी ब्यूरो के पास घूस मांगने की शिकायतें आना बंद हो जाएंगी।
सरकार को केवल धावा दलों पर निर्भर रहने के बजाय भूमि सुधार, निबंधन, निर्माण और पुलिस जैसे संवेदनशील विभागों में पूरी प्रक्रिया को पेपरलेस और ऑटोमेटेड करना होगा।
जब तक व्यवस्था पारदर्शी नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचारियों के पकड़े जाने के रिकॉर्ड बनते रहेंगे और आम नागरिक अपनी ही जायज सेवाओं के लिए रिश्वत देने को विवश रहेगा।