आईजी की जनसुनवाई में जनता की आवाज— अब असली परीक्षा ‘सुनने’ की नहीं, न्यायपूर्ण कार्रवाई की है!
आईजी की जनसुनवाई में जनता की आवाज—
अब असली परीक्षा ‘सुनने’ की नहीं, न्यायपूर्ण कार्रवाई की है!
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
25 सितंबर 2026
गयाजी : जनता जब अपनी शिकायत लेकर पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी के दरवाजे तक पहुंचती है, तो वह केवल एक आवेदन लेकर नहीं आती। उसके साथ आती है—न्याय की उम्मीद, व्यवस्था पर भरोसा और वर्षों से लंबित समस्या का समाधान पाने की अंतिम उम्मीद।
25 सितंबर 2026 को पुलिस महानिरीक्षक कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई इसी लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आई। उपलब्ध विवरण के अनुसार बड़ी संख्या में आमजन अपनी समस्याओं और शिकायतों को लेकर पहुंचे।
पुलिस महानिरीक्षक विकास वैभव द्वारा प्रत्येक आवेदक की बात गंभीरता से सुनी गई तथा मामलों के त्वरित और विधिसम्मत निवारण के लिए संबंधित पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।
लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल भी जन्म लेता है—
जनसुनवाई में शिकायत सुन लेना समाधान की शुरुआत है, समाधान स्वयं नहीं।
फरियादी की असली उम्मीद आदेश की कॉपी में नहीं, कार्रवाई के परिणाम में होती है।
जनता को यह जानने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती कि उसका आवेदन किस अधिकारी को भेजा गया।
उसे जानना होता है—
उसकी शिकायत पर जांच कब शुरू होगी?
संबंधित थाना क्या कार्रवाई करेगा?
FIR योग्य मामला है तो FIR होगी या नहीं?
जांच निष्पक्ष होगी या प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में?
पीड़ित को उसकी शिकायत की प्रगति की जानकारी मिलेगी या नहीं?
दोषी पाए जाने पर कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?
यही किसी भी जनसुनवाई की वास्तविक कसौटी है।
‘सुना गया’ से आगे बढ़कर ‘न्याय हुआ’ तक पहुंचना जरूरी
पुलिस व्यवस्था में जनसुनवाई की सबसे बड़ी उपयोगिता यही है कि थाना अथवा स्थानीय स्तर पर समाधान नहीं मिलने पर नागरिक वरिष्ठ अधिकारी तक अपनी बात पहुंचा सके।
यह व्यवस्था पुलिस और जनता के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
लेकिन यदि जनसुनवाई में आवेदन लेने के बाद वही शिकायत फिर उसी व्यवस्था में चली जाए, जहां से फरियादी पहले ही निराश होकर आया था, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
फिर जनसुनवाई का अंतिम परिणाम क्या रहा?
इसलिए प्रत्येक आवेदन का ट्रैकिंग नंबर, जिम्मेदार अधिकारी, कार्रवाई की समय-सीमा और अंतिम निष्पादन रिपोर्ट जैसी व्यवस्था जनता के विश्वास को और मजबूत कर सकती है।
कानून सबके लिए समान—यही पुलिसिंग की आत्मा
पुलिस के सामने आने वाले मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है—व्यक्ति नहीं, कानून महत्वपूर्ण हो।
गरीब हो या प्रभावशाली, महिला हो या पुरुष, कमजोर हो या ताकतवर—शिकायत की जांच तथ्य और कानून के आधार पर होनी चाहिए।
जनसुनवाई तभी सार्थक मानी जाएगी जब फरियादी को यह भरोसा हो कि उसकी बात इसलिए सुनी जा रही है क्योंकि वह नागरिक है, न कि इसलिए कि उसके पीछे कोई राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक प्रभाव है।
जनसुनवाई की सफलता का नया पैमाना तय करने का समय :
अब समय आ गया है कि जनसुनवाई को केवल एक कार्यक्रम न माना जाए।
इसके लिए पांच सवाल सार्वजनिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं—
1. कितने आवेदन आए?
2. कितने मामलों में तत्काल कार्रवाई हुई?
3. कितने मामलों की जांच लंबित है और क्यों?
4. कितने मामलों में अंतिम निर्णय हुआ?
5. कितने फरियादियों ने वास्तव में राहत प्राप्त की?
यदि इन पांच सवालों के जवाब पारदर्शी तरीके से सामने आने लगें, तो जनसुनवाई महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहेगी, बल्कि जवाबदेह पुलिसिंग का प्रभावी मॉडल बन सकती है।
फोटो से आगे की कहानी लिखनी होगी
जनसुनवाई की तस्वीर में एक तरफ अधिकारी हैं और दूसरी तरफ आम नागरिक।
यदि किसी पीड़ित की शिकायत पर निष्पक्ष जांच होती है, यदि लंबित मामला आगे बढ़ता है, यदि दोषी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होती है और यदि निर्दोष व्यक्ति को राहत मिलती है—तभी जनता कहेगी कि उसकी आवाज वास्तव में सुनी गई।
पुलिस और जनता के बीच भरोसे की डोर मजबूत हो
पुलिस की शक्ति केवल कानून लागू करने में नहीं, बल्कि नागरिक के भीतर सुरक्षा का विश्वास पैदा करने में भी है।
जनसुनवाई उस विश्वास को मजबूत करने का अवसर है।
25 सितंबर की यह पहल इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अब जरूरत है कि जनसुनवाई में दिए गए निर्देशों की समयबद्ध निगरानी और अनुपालन समीक्षा भी हो।
क्योंकि—
“फरियादी को सुनना संवेदनशीलता है,
समस्या का निष्पक्ष समाधान करना जवाबदेही है,
और न्याय मिलने तक मामले की निगरानी करना सुशासन है।”**
अब जनता की नजर इस बात पर रहेगी कि आज सुनी गई आवाजें कल की कार्रवाई में कितनी दिखाई देती हैं।