आस्था का महाकुंभ और प्रशासनिक कसौटी: कागजी चाक-चौबंद व्यवस्था को धरातल पर उतारने की अग्निपरीक्षा,
आस्था का महाकुंभ और प्रशासनिक कसौटी:
कागजी चाक-चौबंद व्यवस्था को धरातल पर उतारने की अग्निपरीक्षा,
विजय कुमार वरिष्ठ पत्रकार,
गयाजी : सनातन धर्म की पौराणिक चेतना में ‘गया जी’ केवल एक भौगोलिक भू-भाग नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और मोक्ष प्राप्ति का सर्वोपरि तीर्थ है।
25 सितंबर से प्रारंभ होने वाला पितृपक्ष महासंगम देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं की आध्यात्मिक आस्था का केंद्र बनने जा रहा है।
हरिदास सेमिनरी के सभागार से जिला प्रशासन और पुलिस महकमे ने जो संयुक्त रूपरेखा पेश की है, वह दर्शाती है कि इस बार आयोजन को केवल एक पारंपरिक मेले के रूप में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के 'मेगा इवेंट मैनेजमेंट' के रूप में देखा जा रहा है।
365 सेक्टरों का प्रशासनिक चक्रव्यूह:
योजनाबद्ध या चुनौतीपूर्ण?
प्रशासन द्वारा मेला क्षेत्र को 16 सुपर जोन, 45 जोन और 365 सेक्टरों में विभाजित करना एक सुविचारित रणनीति है।
श्मशान घाट से गया जी डैम तक 50 हजार श्रद्धालुओं के एक साथ तर्पण की क्षमता, विष्णुपथ और सीता पथ पर नए घाटों का निर्माण बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
किंतु, गया की भौगोलिक संरचना और विष्णुपद क्षेत्र की ऐतिहासिक संकीर्ण गलियां प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी करती हैं।
अतीत के कड़वे अनुभव सिखाते हैं कि अत्यधिक भीड़ के दौरान संकीर्ण मार्गों पर बना ‘बॉटलनेक’ किसी भी व्यवस्था को ध्वस्त कर सकता है। ऐसे में संयुक्त आदेश का अक्षरशः पालन और नोडल पदाधिकारियों की तत्परता ही किसी भी भगदड़ या अव्यवस्था को रोक सकती है।
'पिंडदान ऐप' और सेवा भाव:
डिजिटल दक्षता बनाम मानवीय संवेदना,
जिलाधिकारी द्वारा ‘पिंडदान गयाजी’ ऐप के जरिए शिकायतों के निवारण पर जोर देना प्रशासनिक आधुनिकीकरण का स्वागतयोग्य पहलू है। परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि पिंडदान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं में एक बड़ा वर्ग ग्रामीण पृष्ठभूमि और बुजुर्गों का होता है, जो स्मार्ट तकनीक से अनभिज्ञ हैं।
अतः प्रशासन का वास्तविक मूल्यांकन ऐप के डाउनलोड्स से नहीं, बल्कि फील्ड में तैनात दंडाधिकारियों और पुलिसकर्मियों के मानवीय दृष्टिकोण से होगा।
ब्रीफिंग में दिया गया "ड्यूटी नहीं, सेवा भाव" का मंत्र केवल भाषणों तक सीमित न रहकर कतारों में थके, भटके और प्यासे तीर्थयात्रियों के साथ पुलिस के व्यवहार में परिलक्षित होना चाहिए।
बुनियादी नागरिक सुविधाएं और सुरक्षा के मोर्चे :
स्वच्छता एवं जनस्वास्थ्य लाखों की आमद के बीच अस्थायी शौचालयों की 24 घंटे सफाई, शुद्ध पेयजल और खान-पान की गुणवत्ता पर कड़ा पहरा सबसे बड़ी अनिवार्यता है।
महामारियों और मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए स्वास्थ्य शिविरों का सक्रिय रहना जरूरी है।
सरोवर व घाटों पर जल-सुरक्षा:
गोदावरी तालाब से लेकर देवघाट तक SDRF और गोताखोरों की सतर्कता में एक पल की भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।
अपराध नियंत्रण व वित्तीय सुरक्षा:
एसएसपी द्वारा चिन्हित एटीएम केंद्रों की निगरानी, डिजिटल फ्रॉड से तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और जेबकतरों/असामाजिक तत्वों पर नकेल कसने के लिए सादे लिबास में पुलिस की तैनाती वक्त की मांग है।
निष्कर्ष:
'अतिथि देवो भव:' की वास्तविक परीक्षा
पितृपक्ष मेला बिहार की सांस्कृतिक अस्मिता और प्रशासनिक साख की अंतरराष्ट्रीय कसौटी है।
जब दुनिया भर से लोग अपने पितरों को तर्पण देने फल्गु के तट पर आते हैं, तो वे यहां से केवल धार्मिक पुण्य नहीं, बल्कि बिहार की व्यवस्था और अतिथि-सत्कार की छवि भी साथ ले जाते हैं।
ब्रीफिंग की मेज से निकला 'ब्लूप्रिंट' सराहनीय है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतिम पायदान पर खड़ा सेक्टर दंडाधिकारी और पुलिस जवान धूप और बारिश के बीच कितनी निष्ठा से अपने कर्तव्य पर डटा रहता है।
प्रशासन के लिए यह 17 दिन कागजी निर्देशों को धरातल पर जीवंत करने की अग्निपरीक्षा हैं।