आईटी सेल और युवा भारत: रोजगार, ट्रोलिंग और मानसिक स्वास्थ्य का संकट
भारतीय लोकतंत्र के समकालीन परिदृश्य में सोशल मीडिया को कभी एक स्वतंत्र, समावेशी माध्यम के रूप में देखा गया था, जो समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों को मुख्यधारा की चर्चाओं में आवाज उठाने का अवसर देगा। लेकिन डिजिटल पूंजीवाद के इस दौर में, ये मंच वैचारिक ध्रुवीकरण, दुष्प्रचार और मतदाताओं के मानसिक हेरफेर के 'डिजिटल कुरुक्षेत्र' बन चुके हैं।
वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से भारत ने तीव्र विकास तो दर्ज किया, लेकिन इसकी सबसे बड़ी त्रासदी 'रोजगारविहीन विकास' और 'रोजगार-ह्रास विकास' बनना हो रहा है। शिक्षित युवाओं के लिए स्थायी आजीविका के साधन सिकुड़ रहे हैं। सरकारी परीक्षाओं में पेपर लीक, परीक्षाओं का बार-बार निरस्त होना और चयन में वर्षों का विलंब इस निराशा को भयावह बना देता है।
जब देश का युवा खुद को मुख्यधारा के रोजगार से बाहर पाता है, तो रोजगार के अभाव में कुछ युवा राजनीतिक दलों के सूचना प्रौद्योगिकी प्रभागों यानी 'आईटी सेल' (IT Cell) और संविदात्मक ट्रोलिंग नेटवर्क का हिस्सा बनने के लिए मजबूर हो जाते है। समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से, यह श्रम कोई स्वैच्छिक वैचारिक आंदोलन नहीं बल्कि शोषक 'डिजिटल आजीविका' बन चुका है।
कबीरा खड़ा बज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥
आज के कुछ आईटी सेल कार्यकर्ता कबीर के इस दर्शन के बिल्कुल उलट काम कर रहा है। उसकी आजीविका ही 'काहू से दोस्ती और सबसे बैर' पर टिकी है। कुछ राजनीतिक डिजिटल नेटवर्कों में कार्यरत युवाओं का काम आक्रामक प्रचार, विरोधियों की आलोचना और कभी-कभी भ्रामक सामग्री के प्रसार से जुड़ा होता है। सांप्रदायिक और भ्रामक सामग्री फैलाने वाले ये युवा, वक़्त गुजरते गुजरते खुद अपनी ही नियति से ट्रोल हो चुके होते हैं।
राजनीतिक डिजिटल श्रम की संरचना और रोजगार की अनिश्चितता
राजनीतिक आईटी सेल और दुष्प्रचार नेटवर्कों में काम करने वाले युवाओं का ढांचा अत्यधिक अनौपचारिक, विखंडित और शोषक है। नीति आयोग (NITI Aayog) के आकलनों के अनुसार, भारत में गिग अर्थव्यवस्था में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या वर्ष 2029-30 तक बढ़कर 2.35 करोड़ होने की संभावना है। राजनीतिक दलों द्वारा संचालित ये डिजिटल नेटवर्क भी इस गिग अर्थव्यवस्था का एक 'अघोषित हिस्सा हैं, ये युवा भी इसी गिग अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों पर काम करते हैं, जहां काम की कोई निश्चित अवधि नहीं होती और न ही कोई औपचारिक श्रम अनुबंध दिया जाता है।
"कुछ राजनीतिक आईटी नेटवर्कों में कार्यरत युवाओं के अनुभव यह संकेत देते हैं कि…इनका प्राथमिक कार्य राजनीतिक आकाओं के इशारे पर रात-दिन भ्रामक विमर्श बनाना और सोशल मीडिया एल्गोरिदम को प्रभावित करना होता है। उत्तर प्रदेश मे एक पार्टी के आईटी सेल के एक पूर्व पदाधिकारी ने स्वीकार किया था कि उनका मुख्य उद्देश्य चुनाव से पहले मतदाताओं के मस्तिष्क को इस तरह नियंत्रित करना था कि वे हर तरफ केवल पार्टी का ही संदेश देखें।( https://share.google/tkhPoYBk7tCXYhRPZ )
इस दुष्प्रचार तंत्र के निम्न-स्तरीय कार्यकर्ताओं के पास रोजगार की न्यूनतम सुरक्षा भी नहीं होती। स्वाती चतुर्वेदी की खोजी पुस्तक 'आई एम ए ट्रोल' में उजागर किया गया है कि ये कार्यकर्ता अत्यधिक दबाव में काम करते हैं। जब भी ये किसी कानूनी जांच में फंसते हैं, तो राजनीतिक दल तुरंत इनसे दूरी बना लेते हैं।
झूठ का मनोवैज्ञानिक रोगविज्ञान: व्यवहार में हिंसक परिवर्तन
"दुष्प्रचार, आक्रामक राजनीतिक संदेशों और विरोधियों के प्रति शत्रुतापूर्ण सामग्री के निरंतर प्रसार में संलग्न रहना और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील संदेशों का निर्माण करना इनमे से कुछ आई टी सेल कामगारों की कार्यशैली का हिस्सा है। इस हिंसक डिजिटल वातावरण के निरंतर संपर्क में रहने के कारण स्वयं इन श्रमिकों के व्यवहार और संवेदनाओं में गहरा विनाशकारी बदलाव आता है।"Journal of Personality and Individual Differences"में प्रकाशित एक अध्ययन से यह संकेत मिलते है कि लगातार ऑनलाइन ट्रोलिंग में संलिप्त रहने वाले व्यक्तियों में 'डार्क टेट्राड' व्यक्तित्व लक्षणों की संभावना प्रबल होती है, जिसके अंतर्गत दूसरों को मानसिक आघात देकर आनंद प्राप्त करने की प्रवृत्ति ,सहानुभूति की कमी,और दूसरों को मोहरा बनाकर इस्तेमाल करने की कला शामिल हैं।
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक आक्रामक ऑनलाइन अभियानों और ट्रोलिंग गतिविधियों मे संलिप्त रहता है, तो वह 'ऑनलाइन संकोचहीनता प्रभाव' का शिकार हो जाता है। इंटरनेट की गुमनामी के कारण इन श्रमिकों को लगता है कि उनके कृत्यों का कोई भौतिक प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिससे वे अन्य उपयोगकर्ताओं को वास्तविक इंसान मानने के बजाय केवल 'डिजिटल अमूर्तता' समझने लगते हैं। इस मानसिक परिवर्तन के कारण उनके भीतर दूसरों की पीड़ा पर खुशी महसूस करने की कुत्सित भावना का विकास होता है।
मधुर वचन है औषधि, कटुक वचन है तीर।
श्रवन द्वार ह्वै संचरे, सालै सकल सरीर॥
रहीम का यह दोहा आज के ट्रोल युग में एक नई प्रशासनिक चेतावनी की तरह लगता है। आज ये कटुक वचन स्मार्टफोन की स्क्रीन से निकलकर सीधे समाज के दिल और दिमाग को छलनी कर रहे हैं।
नफरत के डिजिटल शिकार: लैंगिक और सामाजिक हिंसा की भयावहता
इस संगठित डिजिटल आक्रामकता का सबसे क्रूर प्रभाव समाज के संवेदनशील और हाशिए पर खड़े समूहों पर पड़ता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया (Amnesty International India) द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन के आंकड़े इस खौफनाक हकीकत को बयां करते हैं। इस अध्ययन के अनुसार,सोशल मीडिया पर सक्रिय महिला राजनीतिज्ञों को लक्षित करके भेजे जाने वाले कुल ट्वीट्स में से 13.8 प्रतिशत पूरी तरह से समस्याग्रस्त या अपमानजनक श्रेणियों मे आते है https://share.google/MLstY4LGxEN1IB9MU)जो कि पश्चिमी देशों की तुलना में लगभग दोगुना है।
इस संगठित साइबर हमले में महिलाओं की जाति, धर्म और वैवाहिक स्थिति को हथियार बनाकर उन पर तीखे हमले किए जाते हैं। हाशिए की जातियों से संबंधित महिला राजनेताओं को सामान्य वर्ग की महिलाओं की तुलना में 59 प्रतिशत अधिक जातिगत गालियों का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार, एक धर्म विशेष की महिला राजनीतिज्ञों को अन्य धर्मों की महिलाओं की तुलना में 94.1 प्रतिशत अधिक धार्मिक अपशब्दों का शिकार होना पड़ा। (https://share.google/BJAHnblUaqRt6UGU3 ) ये ऑनलाइन हमले वास्तविक जीवन में अत्यंत विनाशकारी परिणाम देते हैं। मार्च 2024 में आंध्र प्रदेश की गोथी गीतांजलि देवी का मामला व्यापक चर्चा में आया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें सोशल मीडिया पर तीव्र ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा था। बाद में उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया और उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने ट्रोलिंग और उनकी मानसिक स्थिति के बीच संभावित संबंध की जांच की थी।" ( Woman Ends Life After Being Trolled For Praising Jagan Reddy's Party: Cops https://share.google/Khw9NEFRc0FZPNc6L
मानसिक अवसाद और श्रम शोषण का अंतहीन चक्र
जो युवा लंबे समय तक अत्यधिक ध्रुवीकृत डिजिटल राजनीतिक अभियानों और ऑनलाइन संघर्षपूर्ण वातावरण में काम करते हैं…” उनके स्वयं भी गंभीर मानसिक विकारों के दलदल में धंसने की संभावना अधिक प्रबल होती है । (PDF) Gaali cultures: The politics of abusiveexchange on social media https://share.google/eQZNftnlm66tdW0op लगातार हिंसक सामग्री का विश्लेषण और रोजगार की अनिश्चितता उनके मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह तबाह कर देती है। इसके परिणामस्वरूप इन डिजिटल श्रमिकों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर,गंभीर अवसाद,और घबराहट,जैसी बीमारियां आम हो जाती हैं। (https://share.google/0RDOB32eM42baW8gE )
भारत की वर्तमान कानूनी व्यवस्था भी इन श्रमिकों को किसी भी प्रकार की मानसिक या सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही है। देश का नया श्रम कानून यानी 'व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति कोड, 2020' केवल शारीरिक सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि मानसिक-सामाजिक खतरों को नजरअंदाज कर देता है। यद्यपि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 देश के प्रत्येक नागरिक को उपचार का अधिकार प्रदान करता है, परंतु यह नियोक्ताओं पर ऐसा कोई कानूनी दायित्व लागू नहीं करता जिससे कार्यस्थल पर मानसिक तनाव को रोका जा सके।
श्रम अधिकारों की इस शून्यता के बीच, नियोक्ताओं द्वारा संविदात्मक श्रमिकों का शोषण लगातार जारी है। हालांकि, वर्ष 2016 में भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि संविदात्मक और अस्थायी श्रमिक भी समान कार्य के लिए स्थायी कर्मचारियों के समान न्यूनतम मूल वेतन के हकदार हैं, इसके बावजूद देश के प्रीमियर तकनीकी संस्थानों से लेकर कॉर्पोरेट फर्मों तक में इसका सरेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
संस्थागत विफलता और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता
राजनीतिक आईटी सेल और संविदात्मक ट्रोलिंग के जाल में फंसे युवाओं की आजीविका और व्यवहार से जुड़ा यह संकट हमारे देश की आर्थिक विफलता, अपर्याप्त श्रम कानूनों और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनहीन सामाजिक दृष्टिकोण का परिणाम है। जब तक राज्य और समाज मिलकर इन युवाओं को गरिमापूर्ण रोजगार और सुरक्षित कार्यस्थल प्रदान करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएंगे, तब तक हमारी युवा जनसांख्यिकी का एक बड़ा हिस्सा इसी तरह नफरत और मानसिक अवसाद के अंधेरे कुएं में गिरता रहेगा।
इस गंभीर संकट के समाधान के लिए व्यापक कानूनी और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है:
1. आगामी श्रम कोड्स में मानसिक और सामाजिक खतरों को व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के कानूनी दायरे में शामिल किया जाए।
2.सभी संविदात्मक श्रमिकों को सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के अनुरूप स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन और भविष्य निधि (PF) लाभ सुनिश्चित किए जाएं।
4.श्रम कानूनों के अंतर्गत 'नियोक्ता' की वैधानिक परिभाषा का विस्तार किया जाए। इसमें पंजीकृत राजनीतिक दलों और उनके द्वारा वित्तपोषित या संबद्ध डिजिटल एजेंसियों को शामिल किया जाना अनिवार्य हो।
5. सरकार को नई नौकरियों का सृजन करना होगा और भर्ती परीक्षाओं को लीक-मुक्त व समयबद्ध बनाना होगा।
6. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर होने वाली संगठित ट्रोलिंग और सांप्रदायिक घृणा के अभियानों को रोकने के लिए तकनीकी कंपनियों पर सख्त नियम लागू होने चाहिए।
7.युवाओं के लिए गोपनीय, मुफ्त और सुलभ मनोचिकित्सकीय परामर्श सेवाओं (जैसे टेली-मानस हेल्पलाइन) का देशव्यापी स्तर पर विस्तार किया जाना चाहिए।
"कुछ राजनीतिक डिजिटल नेटवर्कों में युवाओं का दुष्प्रचार अभियानों में इस्तेमाल किया जाना लोकतांत्रिक विमर्श और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंता का विषय है।"यदि युवाओं को गरिमापूर्ण रोजगार, श्रम सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई, तो भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावनाएँ कमजोर पड़ सकती हैं।
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लेखक परिचय:
नीरज लाकडा
लेखक, विश्लेषक,शोधकर्ता और समसामयिक विषयों के विश्लेषक हैं