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Missing Millions

By AKHIL SUKANT PAUL • 2026-10-16 10:06 • 19 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
Missing Millions

गुमशुदा लाखों: जनगणना 2027 में हर दिव्यांग व्यक्ति की सही गिनती क्यों ज़रूरी है?

कोई भी देश उन लोगों के लिए प्रभावी योजनाएँ नहीं बना सकता, जिन्हें उसके आँकड़ों में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। भारत की जनगणना 2027 एक अवसर भी है और ज़िम्मेदारी भी। यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि दिव्यांगजन उन लाखों लोगों में शामिल न रह जाएँ, जो आँकड़ों में दर्ज नहीं हो पाते। सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि कितने लोग गिने गए, बल्कि यह भी है कि उनकी विभिन्न दिव्यांगताओं को कितनी सटीकता से दर्ज किया गया।

कई दिव्यांगजनों के लिए अदृश्य रह जाने का सिलसिला जनगणना अधिकारी के पहुँचने से पहले ही शुरू हो जाता है। सामाजिक कलंक के डर से कुछ परिवार दिव्यांगता की जानकारी छिपा सकते हैं। संवाद संबंधी बाधाएँ किसी व्यक्ति को अपनी ज़रूरतें बताने से रोक सकती हैं, जबकि ऐसी दिव्यांगताएँ जो आसानी से दिखाई नहीं देतीं, नज़रअंदाज़ हो सकती हैं। दूर-दराज़ के इलाक़ों में रहने वाले लोगों, संस्थानों में रह रहे व्यक्तियों और अकेले रहने वाले लोगों तक पहुँचना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेष रूप से बधिरांध, बहु-दिव्यांगता वाले और जटिल संचार आवश्यकताओं वाले लोगों के छूटने या उनकी दिव्यांगता का ग़लत वर्गीकरण होने का ख़तरा अधिक हो सकता है।

इसका गंभीर असर पड़ सकता है। जब लोग आँकड़ों में दर्ज नहीं होते, तो उनकी ज़रूरतें सरकारी योजनाओं और नीतियों में भी पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हो पातीं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पुनर्वास, सुगम परिवहन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाएँ उनकी वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखे बिना बनाई जा सकती हैं। इस तरह आँकड़ों में अदृश्यता, नीतियों, बजट और सेवाओं में अदृश्यता का कारण बन सकती है। इसलिए केवल गिना जाना ही पर्याप्त नहीं है; सही जानकारी दर्ज होना भी उतना ही आवश्यक है।

गुमशुदा कड़ी

सरकारी तंत्र के लिए अकेले हर उस व्यक्ति तक पहुँचना मुश्किल हो सकता है, जिसके छूट जाने का ख़तरा है। ग़ैर-सरकारी संगठन (NGOs), दिव्यांगजनों के संगठन (OPDs), सामुदायिक समूह, अभिभावक समूह और स्थानीय स्वयंसेवक जनगणना अधिकारियों तथा उन समुदायों के बीच अहम कड़ी बन सकते हैं, जो अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

ये संगठन जागरूकता बढ़ाने, स्थानीय भाषाओं और सुलभ माध्यमों में सही जानकारी पहुँचाने, छूट जाने के जोखिम वाले लोगों की पहचान करने और परिवारों को अधिकृत जनगणना अधिकारियों से जोड़ने में मदद कर सकते हैं। दिव्यांगजनों के संगठनों की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। दिव्यांगजन केवल जनगणना में शामिल किए जाने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि उन्हें इस प्रक्रिया की योजना बनाने और उसकी निगरानी करने में भी भागीदार बनाया जाना चाहिए। उनके अनुभव सुलभ संचार, जनगणना कर्मियों के प्रशिक्षण, सवालों के परीक्षण और प्रक्रिया में मौजूद कमियों की पहचान करने में मदद कर सकते हैं।

सुलभ और समावेशी हो जनगणना की प्रक्रिया

जनगणना 2027 की योजना और क्रियान्वयन में सुलभता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। किसी व्यक्ति की संवाद क्षमता, आत्मनिर्भरता या दिव्यांगता प्रमाणपत्र न होने के आधार पर उसकी भागीदारी सीमित नहीं होनी चाहिए। जनगणना केवल आँकड़े जुटाने की तकनीकी कवायद नहीं है; यह समानता, समावेशन और जवाबदेही से भी जुड़ा विषय है। विश्वसनीय आँकड़े सरकारों को असमानताओं को समझने, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण करने और समावेशन की दिशा में हुई प्रगति का आकलन करने में मदद करते हैं।

जनगणना की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने घरों तक पहुँचा गया। यह भी देखना होगा कि उन लोगों को शामिल होने का वास्तविक अवसर मिला या नहीं, जिन तक पहुँचना सबसे कठिन है और जिनके छूट जाने की आशंका अधिक है। सरकार को नेतृत्व करना होगा और समुदायों को इस प्रयास में भागीदार बनाना होगा, ताकि कोई भी पीछे न छूटे।

हर व्यक्ति को गिनें। हर दिव्यांगता को सही-सही दर्ज करें। हर समुदाय को साथ जोड़ें। किसी को पीछे न छोड़ें।

एक समावेशी देश की पहचान सिर्फ़ इस बात से नहीं होती कि वह अपने लोगों को कैसे गिनता है, बल्कि इससे होती है कि वह हर व्यक्ति को कितना महत्त्व देता है।

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