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नकल रोकने वाला शिक्षक दोषी या हमारी शिक्षा-व्यवस्था?

By NIDHI SRIVASTAVA • 2026-09-22 12:22 • 6 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
नकल रोकने वाला शिक्षक दोषी या हमारी शिक्षा-व्यवस्था?

नकल रोकने वाला शिक्षक दोषी या हमारी शिक्षा-व्यवस्था?

लेखिका: डॉ. निधि श्रीवास्तव

परीक्षा में नकल रोकना शिक्षक का अपराध नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। लेकिन जब किसी विद्यार्थी को परीक्षा में अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ता है और उसके बाद वह आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तब चर्चा केवल शिक्षक की भूमिका तक सीमित नहीं रह सकती। ऐसे मामलों में उस व्यापक शैक्षणिक वातावरण पर भी विचार करना आवश्यक है जिसमें विद्यार्थी पढ़ता है, प्रतिस्पर्धा करता है और अपनी पहचान बनाता है।

आज उच्च शिक्षा में विद्यार्थी केवल परीक्षा और अंकों के दबाव से नहीं जूझते। सामाजिक पहचान, आर्थिक पृष्ठभूमि, प्रतिस्पर्धा और आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय भी परिसर के वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। आरक्षण भारत की संवैधानिक और नीतिगत व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए किसी वर्ग को दोषी ठहराने के बजाय यह समझना जरूरी है कि परिसर में आरक्षण और सामाजिक पहचान से जुड़े पूर्वाग्रह विद्यार्थियों के अनुभवों को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं।

यदि किसी विद्यार्थी की उपलब्धि को उसकी व्यक्तिगत मेहनत और क्षमता के बजाय केवल उसकी सामाजिक श्रेणी से जोड़कर देखा जाए, या किसी दूसरे विद्यार्थी को यह महसूस कराया जाए कि उसका अवसर किसी आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी के कारण प्रभावित हुआ, तो ऐसी धारणाएं तनाव और असंतोष को बढ़ा सकती हैं। जातिगत टिप्पणियों, अपमान या भेदभाव की किसी भी स्थिति को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव-रोध से संबंधित नियम जारी किए हैं। UGC की 2026 की Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations तथा विद्यार्थियों की शिकायतों के निवारण से संबंधित 2023 के नियम संस्थानों के लिए संबंधित दायित्वों और शिकायत-निवारण व्यवस्था का ढांचा प्रदान करते हैं।

इसलिए परिसर में दो बातें एक साथ स्पष्ट होनी चाहिए—आरक्षण से संबंधित वैधानिक व्यवस्था का सम्मान और किसी भी विद्यार्थी के साथ उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव का निषेध।

नकल रोकने के मामले में भी यही संतुलन आवश्यक है। यदि शिक्षक निर्धारित नियमों के अनुसार नकल रोकता है, तो केवल विद्यार्थी के बाद के दुर्भाग्यपूर्ण कदम के आधार पर शिक्षक को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, यदि किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई के दौरान अपमान, धमकी, सार्वजनिक बेइज्जती या भेदभाव के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

यहीं शिक्षा-व्यवस्था के सामने व्यापक सवाल खड़े होते हैं। क्या हम विद्यार्थियों को केवल परीक्षा पास करना सिखा रहे हैं या असफलता का सामना करना भी? क्या हम प्रतियोगिता के साथ सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता भी सिखा रहे हैं? क्या संस्थानों में अधिकारों के साथ सम्मान और शिकायत-निवारण की प्रभावी व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा रही है?

नकल रोकने वाला शिक्षक और मानसिक दबाव से जूझता विद्यार्थी—इन दोनों को एक-दूसरे का विरोधी बनाकर समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। अनुशासन और विद्यार्थी की गरिमा, दोनों को साथ लेकर चलना आवश्यक है।

ऐसी शिक्षा-व्यवस्था की आवश्यकता है जहां नकल के लिए कोई जगह न हो, वैधानिक आरक्षण व्यवस्था का सम्मान किया जाए, किसी विद्यार्थी को उसकी जाति या आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण अपमानित न किया जाए और नियम लागू करने वाले शिक्षक को भी बिना तथ्यों के दोषी न ठहराया जाए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल निष्पक्ष परीक्षा आयोजित करना नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना भी है जो असमानताओं को समझे, अधिकारों का सम्मान करे, असफलताओं का सामना कर सके और दूसरे व्यक्ति की गरिमा को महत्व दे।

किसी विद्यार्थी की मृत्यु या गंभीर संकट के बाद केवल एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने के बजाय, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर घटना की परिस्थितियों, संस्थागत प्रक्रियाओं और विद्यार्थी के सामने मौजूद सामाजिक एवं शैक्षणिक दबावों की भी जांच की जानी चाहिए। तभी ऐसी घटनाओं से सीख लेकर शिक्षा-व्यवस्था में आवश्यक सुधारों पर सार्थक चर्चा संभव होगी।

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