National

वर्दी पर कालिख: जब रक्षक ही बना भक्षक, बक्सर में 50 हजारी दारोगा पर निगरानी का करारा वार,

By VIJAY KUMAR • 2026-10-17 04:59 • 3 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
वर्दी पर कालिख:  जब रक्षक ही बना भक्षक, बक्सर में 50 हजारी दारोगा पर निगरानी का करारा वार,

​

विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
17 अक्टूबर 2026,
पटना : ​बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' के दावों के बीच निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने एक बार फिर वर्दी के उस चेहरे को बेनकाब किया है, जो आम नागरिक के भरोसे का सौदा कर रहा था।

बक्सर जिले के ब्रह्मपुर थाने में पदस्थापित पुलिस अवर निरीक्षक नीरज कुमार का पचास हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ा जाना केवल एक दारोगा की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि थाने के स्तर पर जड़े जमा चुके वसूली तंत्र पर तमाचा है।

​कानून की चौखट पर 'सौदेबाजी' :
​मामला बेहद गंभीर और संवेदनशील है। एक मां अपने साथ हुई नाइंसाफी की गुहार लेकर थाने पहुंचती है, प्राथमिकी दर्ज होती है (कांड सं0-238/26)। उम्मीद थी कि पुलिस तत्परता से जांच करेगी और दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाएगी।
लेकिन केस के अनुसंधान और कार्रवाई के नाम पर दारोगा ने उसी पीड़ित परिवार को दुधारू गाय समझ लिया। पीड़ित परिवार न्याय के लिए गिड़गिड़ाता रहा और खाकीधारी दारोगा अपनी जेब गर्म करने की शर्त रखता रहा।
यह स्थिति दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर थानों में आम आदमी के लिए एफआईआर दर्ज कराना जितना कठिन है, दर्ज केस में निष्पक्ष कार्रवाई पाना उससे भी अधिक दुरूह हो चुका है।

​निगरानी का त्वरित चक्रव्यूह :
​जब पीड़ित अमरनाथ कुमार यादव ने रिश्वत देने के बजाय भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने का संकल्प लिया, तो निगरानी ब्यूरो ने भी सराहनीय तत्परता दिखाई।
पुलिस निरीक्षक राजेश चौधरी की जांच और वरीय पुलिस उपाधीक्षक विनोद कुमार के नेतृत्व में गठित धावादल ने थाने स्थित दारोगा के कमरे में ही ऐसा चक्रव्यूह रचा कि कानून के तथाकथित पहरेदार को रंगेहाथ 50,000 रुपए नकद के साथ दबोच लिया गया।

​आंकड़ों की गवाही:
सुधरने को तैयार नहीं भ्रष्ट तंत्र,
​निगरानी ब्यूरो के आंकड़े जहां एक ओर एजेंसी की मुस्तैदी दर्शाते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक ढांचे की सड़ांध को भी उजागर करते हैं। वर्ष 2026 में अब तक 113 सरकारी मुलाजिमों का घूस लेते रंगेहाथ पकड़ा जाना यह साबित करता है कि कड़ी कार्रवाइयों के बावजूद सरकारी महकमों में बैठे रिश्वतखोरों के मन से कानून का खौफ खत्म हो चुका है।
थाने से लेकर प्रखंड और कलेक्ट्रेट तक, बिना 'सुविधा शुल्क' के फाइल आगे न सरकने की बीमारी नासूर बन चुकी है।

​निष्कर्ष:
रंगेहाथ गिरफ्तारी से आगे की दरकार,
​महज निलंबन या गिरफ्तारी से यह बीमारी खत्म नहीं होगी।
जरूरत इस बात की है कि:
​ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों पर स्पीडी ट्रायल चलाकर त्वरित सजा दिलाई जाए।
​भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत इनकी अवैध संपत्तियों को जब्त करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए।
​थानों में लंबित कांडों की नियमित मॉनिटरिंग वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाए, ताकि कोई भी जांच अधिकारी केस दबाकर उगाही का जरिया न बना सके।
​बक्सर की यह कार्रवाई उन तमाम खाकीधारियों के लिए चेतावनी है जो वर्दी की आड़ में दलाली की दुकान चला रहे हैं—कानून के हाथ लंबे हैं और भ्रष्टाचार की उम्र छोटी!

VIJAY KUMAR 1 follower