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शिक्षा मनोविज्ञान और बाल मनोविज्ञान की कसौटी पर कोचिंग संस्कृति

By SATYAVIR SINGH • 2026-10-09 06:01 • 7 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
शिक्षा मनोविज्ञान और बाल मनोविज्ञान की कसौटी पर कोचिंग संस्कृति

कोचिंग से ज्यादा जरूरी है बच्चों के बचपन और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा

बिजनौर के जिलाधिकारी उमेश प्रताप सिंह के 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कोचिंग में प्रवेश न देने संबंधी निर्देश से शिक्षा व्यवस्था में नई बहस शुरू हो गई है।

आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में शिक्षा बच्चों के सर्वांगीण विकास का माध्यम बनने के बजाय अंकों और सफलता की दौड़ का हिस्सा बनती जा रही है। कम उम्र में ही बच्चों को कोचिंग सेंटरों में भेजने की प्रवृत्ति ने उनके बचपन, मानसिक स्वास्थ्य और स्वाभाविक विकास पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में 16 वर्ष से कम उम्र के विद्यार्थियों को कोचिंग सेंटरों में प्रवेश न देने संबंधी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। यह पहल केवल नियमों के अनुपालन का विषय नहीं, बल्कि बाल मनोविज्ञान और शिक्षा के मूल उद्देश्यों पर विचार करने का अवसर भी है।

बचपन पर बढ़ता प्रतिस्पर्धा का दबाव

बाल मनोविज्ञान के अनुसार, बचपन सीखने, खेलने, जिज्ञासा विकसित करने और सामाजिक व्यवहार अपनाने की अवस्था है। इस उम्र में बच्चों की मानसिक क्षमताएँ, भावनात्मक परिपक्वता और एकाग्रता धीरे-धीरे विकसित होती हैं। यदि उन पर कम उम्र से ही अच्छे अंक लाने, परीक्षा में आगे रहने और दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव डाला जाए, तो उनमें चिंता, असुरक्षा और असफलता का भय पैदा हो सकता है।

प्रत्येक बच्चे की सीखने की गति, रुचि और क्षमता अलग-अलग होती है। सभी बच्चों से एक जैसा प्रदर्शन करने की अपेक्षा करना उनकी व्यक्तिगत भिन्नताओं की अनदेखी है। लगातार तुलना और अत्यधिक अपेक्षाएँ बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकती हैं।

रटने से नहीं, समझने से होगा विकास

बच्चे अनुकूल वातावरण, पर्याप्त समय और अपनी जिज्ञासाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता मिलने पर बेहतर सीख सकते हैं। खेल, गतिविधियों और अनुभवों के माध्यम से प्राप्त ज्ञान भी उनकी सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बना सकता है। इसके विपरीत, अत्यधिक पढ़ाई और लगातार अभ्यास का दबाव सीखने को बोझ बना सकता है।

विद्यालयी शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाना नहीं, बल्कि बच्चों में तार्किक चिंतन, रचनात्मकता, समस्या-समाधान और सामाजिक कौशल विकसित करना भी है। अनावश्यक कोचिंग पर निर्भरता बच्चों के स्वाध्याय और स्वतंत्र चिंतन के अवसरों को सीमित कर सकती है।

अभिभावकों की भूमिका भी अहम

बच्चों को कोचिंग भेजने के पीछे अभिभावकों की चिंता, सामाजिक प्रतिस्पर्धा और बेहतर भविष्य की आकांक्षा जैसे कारण होते हैं। लेकिन अभिभावकों को समझना होगा कि प्रत्येक बच्चा अलग होता है। उसकी तुलना दूसरे बच्चों से करने के बजाय उसकी रुचियों और क्षमताओं को पहचानना जरूरी है। पर्याप्त नींद, खेलकूद, मनोरंजन और परिवार के साथ समय बिताना भी स्वस्थ मानसिक विकास के लिए आवश्यक है।

नियमों के साथ बदले सोच

कोचिंग सेंटरों के संचालन से जुड़े नियमों का प्रभावी अनुपालन जरूरी है। साथ ही विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, शिक्षकों का मार्गदर्शन और अभिभावकों में मनोवैज्ञानिक जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है।

आखिरकार, शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को केवल सफल प्रतियोगी बनाना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मविश्वासी, संवेदनशील और विवेकशील इंसान बनाना है। कम उम्र में कोचिंग के दबाव को नियंत्रित करने की पहल तभी सार्थक होगी, जब समाज अंकों की दौड़ से आगे बढ़कर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, खुशियों और स्वाभाविक विकास को प्राथमिकता देगा।

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