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उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ डिजिटल पैमाईश अभियान

By SATYAVIR SINGH • 2026-07-13 13:44 • 4 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ डिजिटल पैमाईश अभियान

उत्तर प्रदेश सरकार ने भूमि विवादों के त्वरित और पारदर्शी समाधान के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सहारनपुर से विशेष भूमि पैमाइश अभियान का शुभारंभ करते हुए घोषणा की कि 1 जुलाई से 15 अगस्त 2026 तक पूरे प्रदेश में मिशन मोड में अभियान चलाकर राजस्व संहिता की धारा-24 के अंतर्गत भूमि पैमाइश एवं सीमांकन से जुड़े 79,157 लंबित प्रकरणों का समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण निस्तारण किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह अभियान किसानों और आम नागरिकों की वर्षों से लंबित समस्याओं के समाधान का माध्यम बनेगा और भूमि विवादों में उल्लेखनीय कमी लाएगा।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि अभियान के दौरान प्रत्येक प्रकरण का निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, उप जिलाधिकारी (राजस्व), उप जिलाधिकारी, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और लेखपाल समन्वित रूप से कार्य करेंगे। अभियान की नियमित निगरानी राजस्व परिषद की अध्यक्षा करेंगी, जिससे कार्य की गुणवत्ता और समयसीमा दोनों सुनिश्चित हो सकें।

क्या है डिजी रोवर जीएनएसएस तकनीक?

इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी डिजी रोवर जीएनएसएस (Global Navigation Satellite System) तकनीक है। यह आधुनिक उपग्रह आधारित सर्वेक्षण प्रणाली है, जो जीपीएस समेत विभिन्न वैश्विक नेविगेशन उपग्रहों से प्राप्त संकेतों की मदद से भूमि की स्थिति और सीमाओं का अत्यंत सटीक निर्धारण करती है। पारंपरिक पैमाइश की तुलना में यह तकनीक अधिक तेज, वैज्ञानिक और त्रुटिरहित मानी जाती है। इससे भूमि सीमांकन में पारदर्शिता बढ़ेगी, मानवीय भूल की संभावना घटेगी और विवादित भूखंडों का प्रमाणिक निर्धारण आसान होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, तकनीक आधारित पैमाइश से न केवल लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण होगा, बल्कि भविष्य में भूमि अभिलेखों की शुद्धता और विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सौहार्द को भी मजबूती मिलेगी।
आमजनों का मानना है कि यदि यह अभियान अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करता है तो उत्तर प्रदेश में राजस्व प्रशासन के आधुनिकीकरण की दिशा में यह एक मील का पत्थर साबित होगा। किसानों को उनकी भूमि का स्पष्ट सीमांकन मिलेगा, आम नागरिकों का प्रशासन पर भरोसा मजबूत होगा और भूमि संबंधी विवादों के समाधान में नई गति आएगी।

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