✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से

 

विशेष रिपोर्ट | स्वास्थ्य–शिक्षा पर केंद्रित विश्लेषण

देश में जाति और आरक्षण की राजनीति चाहे जितनी तेज़ हो, लेकिन एक सच्चाई ऐसी है जिसे कोई नकार नहीं सकता—जब बात जान बचाने की आती है, तो जाति देखी जाती है, आरक्षण। तब केवल एक ही सवाल बचता है—सबसे अच्छा डॉक्टर, सबसे अच्छा अस्पताल।

हाल की घटनाएँ इस सच्चाई को आईना दिखाती हैं।जब ओमप्रकाश राजभर की तबीयत बिगड़ी, तो उत्तर प्रदेश के दर्जनों बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों को छोड़कर उन्हें गुरुग्राम स्थित मेदांता हॉस्पिटल ले जाया गया—जिसे आज यूपी–एनसीआर का सबसे भरोसेमंद सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल माना जाता है।उनके इलाज की ज़िम्मेदारी संभाली—

  • डॉ. राकेश मिश्रा (न्यूरोलॉजी)
  • डॉ. अनूप ठक्कर और विशेषज्ञों की टीम ने

यही नहीं, नेताजी मुलायम सिंह यादव का इलाज भी लंबे समय तक इसी मेदांता हॉस्पिटल में हुआ था।
उनकी चिकित्सा टीम में शामिल थे—

  • डॉ. यतिन मेहता (क्रिटिकल केयर यूनिट हेड)
  • डॉ. सुशील कटारिया (ऑन्कोलॉजिस्ट)
  • डॉ. नितिन सूद (ऑन्कोलॉजिस्ट)
  • डॉ. संजीव गुप्ता (मेडिकल डायरेक्टर)

सवाल सीधा है— अगर आरक्षण ही सर्वोपरि है, अगर योग्यता से ज़्यादा सामाजिक पहचान मायने रखती है,

तो फिर इलाज के समय जाति-आधारित डॉक्टर क्यों नहीं चुने जाते? यह लेख यह नहीं कहता कि SC/ST/OBC वर्ग में योग्य लोग नहीं हैं या General वर्ग ही श्रेष्ठ है।योग्यता हर समाज में होती है—इसमें कोई विवाद नहीं।लेकिन गंभीर सवाल यह है कि—

स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में क्या आरक्षण का अंधाधुंध प्रयोग  आम नागरिकों की जान से खिलवाड़ नहीं बनता? आज देश का गरीब व्यक्ति—चाहे वह किसी भी समाज से हो— अच्छे अस्पताल तक नहीं पहुँच पाता, मजबूरन झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज करवाता है, और कई बार इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाता है

विडंबना यह है कि— जिन नीतियों को “सामाजिक न्याय” के नाम पर लागू किया जाता है, उन्हीं नीतियों का दंश उसी समाज के सबसे कमजोर लोग झेलते हैं।

नेता सुरक्षित अस्पतालों में,विदेशी तकनीक और सर्वोत्तम विशेषज्ञों के बीच इलाज कराते हैं—और आम जनता के लिए छोड़ दी जाती है,  अव्यवस्थित सरकारी व्यवस्था, संसाधनों की कमी,और गुणवत्ता से समझौता।

देश को अब यह तय करना होगा कि—क्या स्वास्थ्य और शिक्षा प्रयोगशाला हैं? या फिर ऐसे क्षेत्र जहाँ केवल योग्यता, प्रशिक्षण और क्षमता ही अंतिम मानदंड हों? यह बहस किसी समाज के खिलाफ नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन के अधिकार के पक्ष में है। क्योंकि अंत में सच्चाई यही है—राजनीति वोट से चलती है, लेकिन अस्पताल में ज़िंदगी सिर्फ काबिलियत से बचती है।

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