✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्र की कलम से, भोपाल (म.प्र.)

देवास में हुए मामले ने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और सरकार की निर्णय प्रक्रिया पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर प्रभारी सहायक आबकारी आयुक्त मंदाकिनी दीक्षित का तत्काल निलंबन सराहनीय कदम माना जा सकता है, परंतु इससे एक और कड़वी सच्चाई भी उजागर होती है—क्या प्रदेश की वर्तमान सरकार कार्रवाई भी जातिगत चश्मे से देखकर कर रही है?

8 नवंबर को शराब ठेकेदार दिनेश मकवाना द्वारा आत्महत्या और फिर 5 दिसंबर को वायरल हुए वीडियो में लगाए गए आरोपों के बाद जिस तेजी से मंदाकिनी दीक्षित को बिना विस्तृत जांच के निलंबित किया गया, वह दर्शाता है कि सरकार किसी भी दबाव में तुरंत निर्णय ले सकती है। परंतु इसी के उलट, तथाकथित  IAS संतोष वर्मा का मामला महीनों से शासन के दरबार में लंबित पड़ा है—जहाँ जालसाजी, अनियमितताओं और गंभीर आरोपों के पर्याप्त प्रमाण मौजूद होने के बावजूद सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है।

क्या यह संयोग है कि दोनों मामलों में पीड़ित और आरोपी की ‘जाति’ बदलते ही सरकार का रवैया बदल गया?

एक मामला जहाँ पीड़ित ‘गैर-सवर्ण’ था, वहाँ तुरन्त कठोर निर्णय—वह भी बिना विस्तृत जांच के। दूसरे मामले में, जहाँ पीड़ित सवर्ण समाज है और आरोपी की ‘जातिगत पहचान’ सत्ता के वोट बैंक से मेल खाती है—वहाँ महीनों से चुप्पी। यह दोहरा चरित्र न सिर्फ प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि प्रदेश की व्यवस्था अब न्याय नहीं, बल्कि जातिगत समीकरणों के आधार पर चल रही है।सरकार को यह समझना होगा कि न्याय तो जाति देखता है और ही वोट बैंक। निलंबन हो—चाहे मंदाकिनी दीक्षित का हो या कार्रवाई—चाहे संतोष वर्मा पर। मानक एक होना चाहिए, पैमाना एक होना चाहिए।

जब शासन खुद दोहरे मानदंड अपनाएगा, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या मध्यप्रदेश में न्याय अब जाति देखकर मिलेगा?जनता जवाब चाहती है… और देरी अब अस्वीकार्य है।

सवर्ण आर्मी मध्य प्रदेश की कड़ी प्रतिक्रिया : उपरोक्त मसले पर जब सवर्ण आर्मी के पदाधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने भी अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। उनका स्पष्ट कहना है कि—वर्तमान प्रदेश सरकार न्याय भी जाति देखकर कर रही है।जो कि सिर्फ प्रशासन के लिए, बल्कि पूरे देश और आम जनमानस के लिए अत्यंत घातक है।”

सवर्ण आर्मी का कहना है कि सरकार का यह रवैया समाज को जातिगत विभाजन की ओर धकेल रहा है,  लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है।उनके अनुसार, यदि सरकार अपनी कार्यशैली में जाति आधारित प्राथमिकता नहीं बदलेगी, तो आने वाले समय में इसका सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर गंभीर परिणाम होंगे।

सरकार को समझना होगा कि न्याय का पैमाना एक होना चाहिए—चाहे आरोपी कोई भी हो और ड़ित कोई भी।न्याय को जातिगत चश्मे से देखना न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी गलत संदेश है।अब जनता पूछ रही है—क्या मध्यप्रदेश में कार्रवाई भी अब जाति देखकर तय होगी? सरकार को जवाब देना ही होगा।

 

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