✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से
देश में एक गंभीर सवाल हवा में तैर रहा है—क्या सरकार निजी सेक्टर की मेरिट को भी राजनीतिक सौदों की भेंट चढ़ाने जा रही है?
एक तरफ निजी कंपनियाँ—Adani, Ambani, Tata, Birla जैसी—दुनिया के बाजारों में भारत का परचम लहरा रही हैं,तो दूसरी तरफ सरकारी कंपनियाँ इतनी तेजी से गिर रही हैं कि लगता है जैसे किसी ने जानबूझकर इन्हें डूबने दिया हो।
कारण साफ है:जहाँ प्राइवेट सेक्टर में काबिलियत ही टिकट है,वहीं सरकारी तंत्र में काबिलियत से ज्यादा पहचान और राजनीति चलती है।
अब निजी कंपनियों पर भी ‘नीतिगत हमला’? सरकार अब निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू करने की तैयारी कर रही है।उद्योग जगत इसे देश की अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रहार बता रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है—“आप नौकरी दे सकते हैं,लेकिन काबिलियत का आरक्षण नहीं कर सकते।काबिलियत के साथ खिलवाड़ किया गया तो देश की रीढ़ ही टूट जाएगी।”
यह कदम केवल रोजगार को प्रभावित नहीं करेगा—यह भारत की ग्लोबल प्रतिस्पर्धा, नवाचार (Innovation),और उद्योगिक क्षमता पर सीधा हमला है।
आलोचकों का कहना है—“यदि फैसले राष्ट्रहित से नहीं, बल्कि वोट बैंक से होंगे,तो देश का भविष्य गर्त में जाने से कोई नहीं रोक सकता।”नीतिगत फैसले ऐसे लग रहे हैं मानो—अर्थव्यवस्था को एक-एक ईंट निकालकर कमजोर किया जा रहा हो।देश की युवा शक्ति से भी बड़ा सवाल पूछ रहा है—“क्या हमारी मेहनत, हमारी पढ़ाई, हमारी काबिलियतकिसी का राजनीतिक प्रयोग बनकर रह जाएगी?”
पर्यवेक्षकों का कहना है—“अभी भी समय है—जाग जाएँ।वरना आने वाले सालों में पछताने की फुर्सत भी नहीं मिलेगी।”एक पुरानी उक्ति है—“जब निर्णय लेने वालों की बुद्धि पर पर्दा पड़ जाए,तो परिणाम विनाशकारी ही होते हैं।”आज भारत की नीतियों पर यह बात भयावह रूप से सटीक बैठती है।
“देश क्षमता से चलता है, राजनीति से नहीं।और अगर क्षमता पर ताला लग गया,तो देश को गिरने से कोई नहीं बचा सकता।”
